शशी कुमार केसवानी

बेख़ौफ़, बेधडक़ बात

मप्र के मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव भूमाफिया हैं या लोकसेवक ये खुद मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव को जनता के इजलास में हाजिर होकर बताना पडेगा, क्योंकि उनके ऊपर करोडों की जमीन खरीदने का आरोप है.
मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव पर जमीन घोटाला के आरोप किसी राजनीतिक दल ने नहीं बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित सत्ता प्रतिष्ठान विरोधी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने लगाए हैं. मुख्यमंत्री पद पर ढाई साल से काम कर रहे मोहन यादव द्वारा की गई इस खरीद- फरोख्त के रहस्योदघाटन को सुपारी पत्रकारिता कहा जा रहा है. ये कहने वाले लोग मोहन मीडिया के लोग हैं.
उज्जैन और आसपास के इलाके में अपने पूरे कुनवे के नाम से जमीन खरीदने के आरोपी मुख्यमंत्री मौन हैं. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल भी इस रहस्य का उदघाटन करने वाले इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है,वे कांग्रेस पर बरस रहे हैं. जबकि कांग्रेस ने इंडियन एक्सप्रेस मे छपी खबर को ही टूल की तरह इस्तेमाल किया है.
मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव को मै तब से जानता हूँ जब वे उज्जैन विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बनाए गये थे. उन्हे जमीनों के धंधे का चस्का तभी से लगा. अन्यथा उनका पुस्तैनी धंधा रेस्टॉरेंट का था. वे चाय, पोहा कचौड़ी समोसा बेचा करते थे तभी कभी-कभी पुराने दिनो की याद आ जाती है तो फूड ब्लागर की तरह रायचंद बन जाते है बारहल अभी बात जमीन की।
भू प्रेमी तो बाद में बने. इसी भूक्षुधा की वजह से वे आज कटघरे में हैं.
भाजपा का सबसे समृद्ध ATM माने जाने वाले डा. मोहन यादव को ‘खाने और खिलाने’ की छूट पार्टी हाई कमान से मिली है. यदि ऐसा न होता तो वे जमीन के धंधे मे शायद हाथ ही न डालते. अब चूंकि मोहन यादव ने ATM बननी स्वीकार कर ही लिया है तो वे निडर भी है. और उन्होने सिंहस्थ से पहले अपने धंधे को चमकाने का अभियान जारी रखा.
मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि डा. मोहन यादव के खिलाफ पार्टी हाईकमान कोई कार्रवाई नहीं करेगी. न कोई मुकदमा कायम होगा,. न कोई SIT गठित की जायेगी. बल्कि मुख्यमंत्री के खिलाफ ये सब कराने वालों पर कोई कार्रवाई होगी?
आपको बता दूं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद मोहन यादव का भूमिप्रेम ऐसा जागा कि उन्होंने भोपाल की जगह उज्जैन को ही अघोषित रूप से मप्र की राजधानी बना दिया.वे दिन भर चाहे कहीं रहें लेकिन घूम -फिर कर रात को उज्जैन पहुंच ही जाते हैं. मोहन बाबू ने कभी भी अपने परिवार को भोपाल के मुख्यमंत्री निवास में नहीं रखा.
मैंने एक बार इसी बात को लेकर मुख्यमंत्री यादव की तारीफ की थी और लिखा था कि मोहन बाबू ने शिवराज सिंह चौहान की तरह मुख्यमंत्री आवास को समानांतर सचिवालय नहीं बनाया, उनकी पत्नी ने वहां ATM नहीं लगाए. तो उज्जैन के एक मित्र ने मुझसे उज्जैन आकर हकीकत का पता करने की सलाह दी थी.
बहरहाल ताजा भूमि विवाद में डा. मोहन यादव अकेले नहीं हैं. पार्टी ने उन्हे फौरी तौर पर संरक्षण दिया है. भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री का बचाव किया है. कुछ लोगों ने इस मुद्दे पर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी पर भी छींटाकसी की है कि जब ये सब हो रहा था, तब वे कहाँ सो रहे थे?
सवाल ये है कि प्रदेश में भूमाफियाओं के खिलाफ मुहिम चलाने का दावा करने वाली भाजपा अब कितने दिन मुख्यमंत्री डा मोहन यादव का बचाव कर पाएगी? यादव विरोधियों ने तो उनके हटाए जाने की उलटी गिनती गिनना भी शुरू कर दी है.
प्रदेश में जमीन से प्रेम करने वाले डा. मोहन यादव अकेले भाजपा नेता नहीं हैं. उन्ही की तरह भाजपा के सिंधिया घराने को भी जमीन से बेतहाशा लगाव है. पिछले दो दशक में इस घराने ने सैकडों एकड जमीन को अपना बताकर सरकारी अधिपत्य से मुक्त कराकर अपनी मिल्कियत बनाया है. भाजपा के दो बडे नेता जयभान सिंह पवैया और स्वर्गीय प्रभात झा, सिंधिया को प्रदेश का सबसे बडा भूमाफिया बता चुके हैं. किंतु इन बेचारों को डा. मोहन यादव के भूलोक के बारे में शायद माहिती नहीं थी.
होगा कुछ भी नही 20 दिन हल्ला होगा और बस शान्त हो जाएगा कोई नई कहानी आ जाएगी सब मस्ती मे मस्त रहेगे जनता मुह ताकती रहेगी।
और नारा तो भाजपा लगाएगी।
अपना नेता कैसा हो?
मोहन यादव जैसा हो!

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER