शशी कुमार केसवानी

इसमें दोष शकर का नहीं बल्कि पूरा शकर माफिया का है। पिछले दिनों नितिन गडकरी और शरद पवार की एक गुप्त बैठक भी हुई थी जिसमें रणनीति तय की गई और शकर के भाव अचानक बढऩे लगे। पिछले कुछ दिनों में ही 15 रूपए के लगभग शकर ने छलांग मारकर लोगों को चौंका दिया। असल छलांग तो माफियाओं ने मारी है शकर तो मु$फत में बदनाम हो रही है। वैसे भी एथेनॉल बनने के बाद शकर का महंगा होना स्वाभाविक था। राजनेता चाहे कितने भी बयान दे दे उससे फक नहीं पड़ेगा। अभी तो ये शुरूआत है शकर आदमी की पहुंच से धीरे-धीरे द ूर होत जाएगी। शकर माफिया ने आम लोगों की मुंह की मिठास छीनने का तय कर लिया है। फिलहाल अभी तो बीते एक महीने में घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें 15 फीसदी से अधिक बढक़र रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। उत्तर प्रदेश में एक्स-मिल कीमतें 4,400 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी हैं, जबकि दिल्ली के थोक बाजार में चीनी 4,800 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक रही है। कीमतों में इस अप्रत्याशित उछाल के बाद सरकार ने चीनी उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ आपात बैठक की है। सट्टेबाजी और जमाखोरी पर लगाम लगाने के लिए कारोबारियों और चीनी मिलों पर स्टॉक सीमा लगाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। हालांकि, सरकार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल चीनी आयात करने की कोई योजना नहीं है।
बढ़ती कीमतों को लेकर चीनी मिलें और व्यापारी आमने-सामने आ गए हैं। चीनी मिल मालिकों का कहना है कि वे किसी भी तरह की जमाखोरी नहीं कर रहे हैं। उनका दावा है कि कीमतों में तेजी आने से पहले ही मिलें जुलाई महीने का अपना 80 फीसदी से अधिक बिक्री कोटा बाजार में जारी कर चुकी थीं। मिलों का आरोप है कि जमाखोरी व्यापारियों के स्तर पर हो रही है। उनका कहना है कि इस पर प्रभावी रोक लगाने के लिए सरकार को भौतिक सत्यापन के साथ सख्त स्टॉक सीमा लागू करनी चाहिए, ताकि कृत्रिम कमी पैदा करने वालों पर कार्रवाई हो सके। व्यापारियों का कहना है कि एक्स-फैक्ट्री कीमतें खुद चीनी मिलें बढ़ा रही हैं। उनका आरोप है कि मिलों ने शुरुआत में उत्पादन के गलत अनुमान पेश कर सरकार से अतिरिक्त 5 लाख टन चीनी के निर्यात की मंजूरी हासिल कर ली, जिससे घरेलू बाजार में आपूर्ति अचानक कम हो गई और कीमतों में तेज उछाल आ गया।

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER