शशी कुमार केसवानी
बात दिल की
नमस्कार दोस्तों, आइए आज ऐसे हास्य अभिनेता की बात करते है जिसने भारतीय फिल्मों की असली कॉमेडी का दौर शुरू किया था। दिल के अंदर लाख तन्हाईया और अकेलापन था लेकिन उनकी हाजिर जवाबी की तो दुनिया कायल थी। फिल्म लेखक सलीम खान और जावेद अख्तर जैसे दिग्गज भी उनकी हाजिर जवाबी को सलाम करते है। हालांकि उनकी हाजिर जवाबी मैं खुद भी देख चुका हूं लेकिन अफसोस आज की युवा पीढ़ी ऐसे कॉमेडियन को लगभग भूल सी गई है। जितनी सौम्य और सरल कॉमेडी टाइमिंग के साथ जॉनी वॉकर करते थे वैसी कॉमेडी बाद में आने वाले महमूद हू-हल्ले के साथ चीखती हुई कॉमेडी करते थे। ये बात अलग है कि वो हीरो के ऊपर भी हावी हो गए पर आश्चर्य इस बात का है कि जॉनी वॉकर के लिए फिल्मों में अलग से गाने लिखे जाते थे उन्हें कॉमेडियन ही नहीं बल्कि सपोर्टिंग एक्टर भी माना जाता था। मैं सरकार से पहले भी आग्रह कर चुका हूं कि ऐसे महान कलाकारों के पुराने बंगले जो विवादों में उलझे है वो कम से कम उनके संग्रहालय बनाकर उन्हेंं अमर कर दिया जाए। ऐसा ही बंगला एक विवादों में पड़ा हुआ है। जिसे सरकार चाहे तो एक शानदार संग्रहालय बना सकती है और एक सच्ची श्रद्धांजलि दे सकती है। तो आइए आज उनसे जुड़े कुछ किस्सों पर बात दिल की करते है ।

‘कहते हैं कि किसी की आंख में आंसू लाने से ज्यादा मुश्किल है, उसके होठों पर मुस्कुराहट लाना लेकिन कुछ लोगों के पास यह कला होती है। इसी विधा में माहिर थे बॉलीवुड के बेहतरीन कॉमेडियन जॉनी वॉकर। उन्होंने अपने अभिनय से लोगों के दिलों पर राज किया। कॉमेडी स्टार जॉनी वॉकर को शायद ही कोई हो जो न जानता हो। उन्होंने हमेशा अपनी एक्टिंग से दर्शकों को हंसाया, ‘सीआईडी’ फिल्म का गीत ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके जरा बचके ये है बॉम्बे मेरी जां’, जॉनी पर ही फिल्माया गया था, गाने में मुबंई में बसों की हालत को दिखाया गया था। 11 नवंबर 1926 को इंदौर में जन्मे जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था। कहा जाता है कि उन्हें जॉनी वॉकर नाम एक्टर गुरुदत्त ने दिया था। गुरुदत्त ने उनका नाम एक प्रसिद्ध शराब के ब्रॉन्ड के नाम पर रखा, खास बात यह थी कि फिल्मों में जॉनी वॉकर अक्सर शराबी का किरदार निभाते थे लेकिन वास्तविक जीवन में उन्होंने कभी शराब को छुआ तक नहीं। जॉनी हर एक्टर की तरह मुंबई एक्टिंग करने का सपना लेकर आए थे लेकिन यह सफर आसान नहीं था। जॉनी आए तो फिल्मों में काम करने का सपना लेकर थे मगर उन्हें शुरूआती दिनों में बस कंडक्टर की नौकरी करनी पड़ी जिसके लिए उन्हें प्रतिमाह 26 रुपए मिलते थे। शुरूआती दिनों में भले ही उन्हें संघर्ष करना पड़ा लेकिन उनके अंदर एक्टिंग का एक ऐसा जुनून था जो कम लोगों में देखा जाता है। इसके अलावा वह लोगों की बेहतरीन मिमिक्री (नकल उतारना) करना भी जानते थे। बस में काम के बीच भी वह लोगों को मिमिक्री करके उनका मनोरंजन करना नहीं भूलते थे। फिर जब एक्टर गुरुदत्त की नजर उन पर पड़ी तब गुरुदत्त ने उनकी प्रतिभा पहचानते हुए उन्हें अपनी फिल्म ‘बाजी’ में ब्रेक दिया। हालांकि इसके बाद से जॉनी ने सफलता की नई कहानी लिखनी शुरू की और आगे बढ़ते रहे। आगे भी जॉनी वाकर ने गुरुदत्त की कई फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘आर-पार’, ‘प्यासा’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ जैसी सुपर हिट फिल्में भी थीं। उन्होंने अपने अलग अंदाज से लगभग 4 दशक तक दर्शकों का मनोरंजन किया। इस दौरान जॉनी वॉकर साहब की मुलाकात नूरजहां से एक फिल्म के सेट पर हुई और प्यार हो गया। जानी वॉकर ने परिवार की इच्छा के खिलाफ जाकर नूरजहां से शादी की, दोनों की मुलाकात 1955 में फिल्म ‘आरपार’ के सेट पर हुई थी, जिसका गीत ‘अरे ना ना ना ना तौबा तौबा’ नूरजहां और जॉनी वॉकर पर फिल्माया जाना था। बॉलीवुड के कॉमेडी एक्टर जॉनी वॉकर ने अपने चुलबुले और मजाकिया अंदाज से दर्शकों का लंबे समय तक मनोरंजन किया। उन पर फिल्माया ‘चम्पी’ (गीत) आज भी लोगों की थकान उतारता है। जॉनी वॉकर की जो सबसे खास बात थी वह यह थी कि एक तरफ वह जहां रोते को हंसा सकते थे, वहीं दूसरी ओर अपनी बेहतरीन अदाकारी से लोगों को इमोशनल करने में भी कसर नहीं छोड़ते थे। ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘आनंद’ में उनकी संजीदगी भरी एक्टिंग ने सबका दिल जीत लिया था। जॉनी वॉकर ने बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ (1957), चेतन आनंद की ‘टैक्सी ड्राइवर’ (1954) और बिमल रॉय की ‘मधुमति’ (1958) में भी बेहतरीन काम किया था। 14 साल के लंबे ब्रेक के बाद उनकी फिल्म ‘चाची 420’ आई थी इसमें कमल हासन और तब्बू ने लीड रोल में थे, यह उनके जीवन की आखिरी फिल्म थी। जॉनी वॉकर को पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड कॉमेडी में नहीं बल्कि उन्हें फिल्मफेयर के बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवॉर्ड 1959 में ‘मधुमती’ में सहायक अभिनेता के रोल के लिए मिला था। इसके बाद फिल्म ‘शिकार’ के लिए उन्हें बेस्ट कॉमिक एक्टर के फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।
व्हिस्की ब्रांड के नाम पर हुए मशहूर : सही अर्थ में उन्हें पहला मौका देवआनंद की गुरुदत्त निर्देशित फिल्म ‘बाजी’ मैं मिला। 1951 में बनी नवकेतन की इस फिल्म में गुरुदत्त को एक शराबी की भूमिका के लिए कलाकार चाहिए था। फिल्म की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। एक बार बस में सफर करते समय बलराज साहनी की मुलाकात उस बस के कंडक्टर बदरुद्दीन काजी से हुई। उन्होंने उनको गुरुदत्त से मिलवाया। वे शराबी की भूमिका इतनी शिद्दत से करते थे कि वे वाकई में शराब पिये नजर आते थे। इससे प्रभावित होकर गुरुदत्त ने उन्होंने उस वक्त के लोकप्रिय व्हिस्की ब्रांड ‘जॉनी वाकर’ के नाम पर उन्हें यह नाम दिया। इस तरह गुरुदत्त को ‘बाजी’ के लिए एक सड़क छाप शराबी मिल गया।
बेटे नासिर ने जारी रखा फिल्मी सफर : सन 1955 में जॉनी वाकर ने फिल्म अभिनेत्री शकीला बानो की बहन नूर बानो से विवाह किया। उनके 3 बेटे और 3 बेटियां हैं। उनका एक बेटा नासिर खान ही उनकी अभिनय परंपरा की विरासत को आगे बढ़ाये हैं, जो बागबान, वाक एंड डस्टर, फोर्स टू जैसी कई फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में काम कर चुके हैं। साथ ही चैनल ‘वी’ और ‘डम डम डिगा डिया’ में भी नजर आ चुके हैं। वर्तमान में वे जी टीवी के धारावाहिक ‘अम्मा’ में प्रमुख भूमिका में नजर आ रहे है। नासिर के अलावा जॉनी वाकर के बाकी बेटे-बेटी विदेश में बसे हैं।
चाची 420 थी आखिरी फिल्म : फिल्मों में हास्य अभिनेता के रूप में पहचान मिल गई। इसके बाद नवकेतन की ही फिल्म ‘आंधियां’ आई. जिसमें जॉनी वाकर की भूमिका को बेहद लोकप्रियता मिली। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा। उन्होंने जाला, हमसफर, श्रीमती 420, प्यासा, कागज के फूल, और चाची 420 जैसी लगभग 300 फिल्मों में काम कर अपने अभिनय से दर्शकों को कायल कर दिया। चाची 420 उनके द्वारा अभिनीत आखिरी फिल्म थी।
ताउम्र दर्शकों को हंसाने वाले जॉनी वॉकर ने 29 जुलाई, 2003 को दुनिया से विदा ले लिया था। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शोक जताते हुए कहा था, ‘जॉनी वॉकर की त्रुटिहीन शैली ने भारतीय सिनेमा में हास्य शैली को एक नया अर्थ दिया है।’ यह बात सच है कि जॉनी वॉकर ने भारतीय सिनेमा में कॉमेडी को एक अलग आयाम दिया। वाजपेयी के अलावा कई बड़े राजनीतिक दिग्गजों ने जॉनी वॉकर के निधन पर गहरा शोर जताया था व उनकी कमी को कभी न पूरा होने वाली क्षति बताया था।
सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए, आ जा प्यारे पास हमारे …
सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए, आजा प्यारे पास हमारे काहे घबराए… यह गीत सुनते ही जेहन में सबसे पहले जिनका नाम आता है, वे हैं जॉनी वॉकर। उनकी शानदार अदाकारी से सजा यह गीत आज भी सुनने वालों को उनकी याद दिला देता है। ‘इंदौर के गौरव’ सीरीज के तहत शहर के उन होनहारों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि दुनिया में इंदौर के नाम को रोशन किया और अपनी कला का लोहा मनवाया। बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री में जॉनी वाकर के नाम से पहचाना जाता है। जॉनी वाकर अपने समय में फिल्मों में सफलता की गारंटी माने जाते थे। वे लगभग 35 वर्षों तक हास्य अभिनेता के रूप में सक्रिय रहे। इस दौरान उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से अनेक फिल्मों के वे नायक भी थे। जॉनी वॉकर का जन्म 11 नवंबर 1923 को मध्यप्रदेश (तत्कालीन मध्यभारत) के इंदौर में एक गरीब मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता जमालुद्दीन काजी इंदौर की एक टेक्सटाइल मिल में मजदूर का कार्य करते थे। मिल क्षेत्र के समीप वायएन रोड पर उनका निवास था। जॉनी सहित उनके 10 बच्चे थे। जॉनी वाकर का बचपन काफी मुश्किल हालातों में बीता। बचपन से ही जानी वाकर को अभिनय का शौक था। इंदौर में वे अक्सर लोगों की नकल उतार कर सबको हंसाया करते थे। परिवार की आर्थिक दशा खराब होने के कारण जॉनी वाकर ने इंदौर में छठी जमात तक उर्दू की तालीम हासिल कर 1942 में अपने पिता जमालुदीन काजी के साथ मुंबई चले गए। आज भी इंदौर में उनके कई मित्र हैं।
लोकप्रियता का यह हाल था कि छोटे भाई कमालुद्दीन काजी ने अपना नाम टॉनी वाकर कर लिया।’आर पार’ की शूटिंग के दौरान नायिका शकीला की छोटी बहन नूरजहाँ से हुई मुलाकात मुहब्बत और फिर गुपचुप निकाह में बदल गई। बांदा और फिर अंधेरी में बने अपने बंगले का नाम ‘नूर विला’ रखा। खूब फिल्में कीं, कई फिल्में बनाई और ‘पहुंचे हुए लोग’ का निर्देशन किया। 35 वर्षों में करीब 325 फिल्में कीं और सिनेमा से संन्यास ले लिया, मगर ऋषिकेश मुखर्जी के आग्रह पर ‘आनंद’ और गुलजार के आग्रह पर ‘चाची 420’ की भावनात्मक भूमिकाएं उन्हें स्वीकार करनी ही पड़ीं। रजनीकांत अक्सर कहा करते थे कि बस कंडक्टर से ऐक्टर बनने की प्रेरणा उन्हें जॉनी वाकर से मिली।







