आपकी बात,

रंजन श्रीवास्तव

दतिया विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव के परिणामों के बाद हार का सारा ठीकरा भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के दरवाजे पर फोड़ दिया है.
यह स्क्रिप्ट तो पहले से ही तय थी. अगर भाजपा जीत जाती तो यह जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व में सत्ता और संगठन की जीत होती और हारने पर यही होना था जो हो रहा है.
दरअसल, इस हार की समीक्षा के लिए जिस तरह आनन-फ़ानन में दो पदाधिकारियों की टीम बनाई गई जिनमें कोई भी बड़ा नाम नहीं था उसी से स्पष्ट था कि भाजपा का प्रदेश नेतृत्व किस तरह की समीक्षा चाहता है.
उपचुनाव का परिणाम सोमवार को आया. मंगलवार को यह टीम बनाई गई और इस टीम ने ईडी और सीबीआई जैसी एजेंसियों को भी मात देते हुए इतनी तेजी से काम किया कि कुछ ही घंटों में, रात होते-होते पार्टी ने इस टीम की रिपोर्ट के आधार पर दतिया जिले में अपने पूरे संगठन को ही भंग कर दिया.
दरअसल, इस तेजी और सतही समीक्षा के पीछे भाजपा के प्रदेश नेतृत्व और सरकार में वह बेचैनी है कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की नजर में इस हार के लिए सरकार और पार्टी नेतृत्व दोनों को जिम्मेदार मानने से बचाया जाय.
और इस बेचैनी के पीछे सिर्फ दतिया की हार नहीं है, बल्कि इससे पहले विजयपुर की भी हार है.
वर्ष 2023 में संपन्न हुए विधान सभा चुनावों के बाद दतिया सहित 3 विधान सभा सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं उनमें सिर्फ बुधनी सीट ही पार्टी जीत पायी है.
आम तौर पर ऐसा देखा गया है कि उपचुनावों में जो पार्टी सत्ता में रहती है, वही जीतती है, अगर कोई बहुत बड़ा उलटफेर नहीं हुआ हो तो.
अगर किसी कार्यकर्ता या नेता या उनके किसी समूह के स्तर पर चुनाव में भितरघात हुआ है या उनके द्वारा निष्क्रियता बरती गयी है तो पार्टी में अनुशासन को स्थापित करने के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए.
पर सवाल यह है कि क्या भाजपा इस हार की तह में जाकर उन फैसलों और परिस्थितियों की भी समीक्षा करेगी जिनके कारण सत्ता में होने के बावजूद पार्टी को लगातार उपचुनावों में झटके लग रहे हैं.
अगर पार्टी मानती है कि दतिया में नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देने के कारण हुए पार्टी में असंतोष ने चुनाव परिणाम को प्रभावित किया तो यह सवाल भी उठता है कि टिकट पर निर्णय लेने वालों की भूमिका की समीक्षा कौन करेगा?
दतिया में जो हुआ उसे केवल “भितरघात” कहकर खत्म कर देना सबसे आसान रास्ता है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि वह परिस्थिति पैदा ही क्यों हुई जिसमें पार्टी के अपने कार्यकर्ता और समर्थक अपने ही उम्मीदवार के खिलाफ खड़े दिखाई दिए.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस ने इस चुनाव में कोई असाधारण प्रदर्शन नहीं किया. उसके वोट 2023 के मुकाबले 22 हजार से ज्यादा घटे हैं. इसके बावजूद भाजपा 2023 के मुकाबले 20 हजार से ज्यादा वोट खोकर चुनाव हार गई. यानी कहानी कांग्रेस के मजबूत होने की नहीं है बल्कि भाजपा के अपने वोटों के खिसकने की है.
अगर मत प्रतिशत भी देखा जाए तो कांग्रेस को 2023 में मिले 50.34% वोट की जगह इस बार सिर्फ 42.39% वोट मिले यानी कांग्रेस के लगभग 8% वोट कम हुए. पर भाजपा के भी 7% से ज्यादा वोट कम हो गए 2023 के मुकाबले.
यही वह बिंदु है जहां सतही समीक्षा और वास्तविक समीक्षा के बीच फर्क दिखाई दिखाई दे सकता है.
भाजपा इस दिवास्वप्न में रही कि आज़ाद समाज पार्टी इस उपचुनाव में कांग्रेस का वोट काटेगी और भाजपा प्रत्याशी की जीत आसान हो जाएगी पर हुआ ये कि आज़ाद समाज पार्टी के प्रत्याशी दामोदर यादव ने 22527 (14.3%) वोट पाकर सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपा के भी वोट भी काट डाले जिनमें ओबीसी वोटर्स भी थे.
साथ ही, पार्टी को यह भी सोचना होगा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की गेम चेंजर स्कीम लाड़ली बहना जिसकी वजह से भाजपा को 2023 में बम्पर मेजोरिटी मिली थी, के जारी रहने के बावजूद भी महिला वोटर्स भारी संख्या में भाजपा के लिए मतदान केंद्रों पर क्यों नहीं आयीं?
अगर भाजपा यह जानना चाहती है कि सत्ता में रहते हुए उसके अपने मतदाता उससे क्यों दूर हुए, तो समीक्षा का दायरा दतिया जिला संगठन से बहुत आगे बढ़ाना होगा.
क्या भाजपा अपनी उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया, स्थानीय संगठन से प्रत्याशी चयन में रायशुमारी, प्रदेश इकाई से लेकर विधान सभा स्तर तक संगठन में उस मशीनरी के कार्य जिसको कार्यकर्ताओं के असंतोष और नाराजगी को समय रहते पढ़कर उसको दूर करना होता है, सरकार की खुफिया एजेंसी की असफलता और चुनाव अभियान में इतनी बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत लगाने के बावजूद भाजपा अपने पारंपरिक समर्थकों को पूरी ताकत से मतदान केंद्रों तक क्यों नहीं ला सकी, की भी समीक्षा करेगी?
एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पार्टी इस हार को केवल संगठनात्मक अनुशासन का मामला मानेगी या इसे राजनीतिक चेतावनी के रूप में भी देखेगी?
क्योंकि दतिया अकेला मामला नहीं है. बुधनी में भाजपा जीत तो गई, लेकिन उसका जीत का अंतर लगभग 91 हजार से घटकर करीब 13 हजार रह गया था जबकि यह सीट केंद्रीय कृषि मंत्री तथा पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पारम्परिक सीट रही है. विजयपुर में भाजपा उम्मीदवार रामनिवास रावत सरकार में मंत्री रहते हुए भी कांग्रेस के उम्मीदवार मुकेश मल्होत्रा से हार गए थे. अब दतिया में पार्टी को 6016 वोट से हार मिली है.

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER