रंजन श्रीवास्तव

कुछ वर्ष पहले, राजस्थान के नागौर जिले के चरणवास गांव के रहने वाले 36 साल के दलित और दिव्यांग किसान मंगल चंद मेघवाल उस समय परेशान हो गए, जब बैंक द्वारा दिए गए लोन का एक हिस्सा चुकाने के बाद शेष राशि नहीं चुका पाने पर बैंक ने उनके खाते को NPA खाते में डाल दिया.
लोन वसूली के लिए पहले बैंक और बाद में बैंक द्वारा शुरू की गई कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की ओर से उन्हें लोन वसूली का नोटिस दिया गया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेघवाल और उनके तीन भाइयों ने वर्ष 2011 में खेती के काम के लिए एक बैंक की बादलवास शाखा से किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के तहत करीब 2.98 लाख रुपये का लोन लिया था और लोन का एक हिस्सा चुका भी दिया था.
जब सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट ने उनकी जमीन जब्त करने का वारंट जारी किया तो बैंक को राजस्थान एग्रीकल्चरल क्रेडिट ऑपरेशन्स (रिमूवल ऑफ डिफिकल्टीज) एक्ट के तहत जमीन की नीलामी करने की अनुमति मिल गई.
जब जमीन की नीलामी की घोषणा माइक पर की गई तो इससे परेशान होकर वह यह पता करने बैंक गए कि अभी कितनी रकम चुकानी बाकी है. बैंक मैनेजर ने उन्हें बताया कि अभी भी 4.59 लाख रुपये चुकाने हैं और ऐसा न करने पर उनकी जमीन नीलाम कर दी जाएगी.
उन्होंने मैनेजर से पूछा कि 2.98 लाख रुपये का लोन बढ़कर 4.59 लाख रुपये कैसे हो गया, जबकि उन्होंने पिछले साल ही 1.75 लाख रुपये चुका दिए थे.
जब बैंक मैनेजर से उन्हें कोई समाधान नहीं मिला और उन्हें लगा कि वे अपनी जमीन नहीं बचा सकते, तो उन्होंने गांव के कुछ साहूकारों से कर्ज लेकर बैंक का लोन चुकाने की सोची. लेकिन साहूकारों से भी उन्हें कोई कर्ज नहीं मिला.
जब साहूकारों तथा अन्य लोगों से उन्हें पैसे नहीं मिले और उन्हें लगा कि अब जमीन को नीलामी से बचा पाना उनके वश में नहीं है, तो एक रात उन्होंने अपने कमरे में छत से लटककर अपनी जान दे दी.
यह देश का इकलौता मामला नहीं है, जिसमें किसी किसान ने बैंक की कार्रवाई से परेशान होकर अपनी जान दे दी.
लगभग हर राज्य में और हर वर्ष ऐसे अनेक किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आते हैं, जिनमें आत्महत्या का कारण फसल खराब होने के बाद कर्ज नहीं चुका पाना और बैंक या साहूकार द्वारा लोन वसूली के लिए परेशान किया जाना बताया जाता है.
NCRB के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में 10786 किसानों और कृषि मजदूरों ने अपना जीवन समाप्त कर लिया. इनमें 4690 किसान तथा 6096 कृषि मजदूर थे. महाराष्ट्र और कर्नाटक किसानों और कृषि मजदूरों की आत्महत्या के मामलों में देश के सभी राज्यों में सबसे ऊपर थे.
गौर करने वाली बात यह है कि जिन किसानों और कृषि मजदूरों के मामलों में परिवार के सदस्य बैंक या साहूकार द्वारा दिए गए लोन को नहीं चुका पाने और उनके द्वारा की गई प्रताड़ना को आत्महत्या का कारण बताते हैं, वहीं पुलिस और प्रशासन ज्यादातर ऐसे मामलों में किसी और कारण को वजह बताता है.
जनवरी 2017 में प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जहां स्थानीय साहूकारों को किसानों की आत्महत्या के मामलों में विलेन के तौर पर दिखाया गया था, वहीं NCRB की वर्ष 2015 की रिपोर्ट के अनुसार अपना जीवन समाप्त करने वाले किसानों में 80 फीसदी किसान ऐसे थे, जो बैंकों या माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से लिए गए लोन को नहीं चुका पाने के कारण परेशान थे.
लेकिन बैंकों की कर्ज वसूली की सारी कार्रवाई प्रताड़ना के बजाय अनुनय और विनय में बदल जाती है, जब लोन कई हजार करोड़ रुपये का हो और लोन लेने वाला कोई उद्योगपति हो.
मीडिया कारोबारी और एस्सेल ग्रुप के पूर्व चेयरमैन सुभाष चंद्र के मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की सिंगल मेंबर बेंच ने रिपेमेंट प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए 22,006.57 करोड़ रुपये के लोन को घटाकर 6.25 करोड़ रुपये कर दिया. यानी करीब 99.97 फीसदी की कमी. कंपनियों के लोन और रिपेमेंट में इस तरह की छूट को कारोबारी भाषा में ‘हेयरकट’ कहा जाता है.
हालांकि, इस मामले में देशभर में हंगामा मचने के बाद इसी ट्रिब्यूनल की पांच सदस्यीय बेंच ने बैंकों की अपील पर सुनवाई करते हुए सिंगल मेंबर बेंच के फैसले पर रोक लगा दी.
अभी इस मामले में ट्रिब्यूनल का अंतिम फैसला आना बाकी है. लेकिन पूरे देश में इस बात पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है कि जब कानून की नजर में सभी बराबर हैं तो क्यों एक आम आदमी और करदाता को बैंक कुछ हजार रुपये के लिए भी हजार बार परेशान करते हैं और कई मामलों में कानूनी प्रक्रिया के तहत उसकी संपत्ति तक नीलाम कर देते हैं, लेकिन उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपये के कर्ज में बहुत आसानी से भारी-भरकम छूट दे दी जाती है.
विजय माल्या, मेहुल चोकसी, नीरव मोदी, जतिन मेहता तथा ऐसे कई अन्य कारोबारी बैंकों से हजारों करोड़ रुपये का लोन लेने के बाद विदेश भाग गए और आज तक सरकार उन्हें कानूनी प्रक्रिया का सामना करने के लिए वहां से वापस नहीं ला पाई है.

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER