रंजन श्रीवास्तव
विपक्ष के कई नेताओं, जिनमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तथा आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल शामिल हैं, ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कई निर्णयों को राष्ट्रद्रोह बताया है।
केजरीवाल ने तो ज्ञानेश कुमार को तत्काल गिरफ्तार कर उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाने की बात तक कही है।
देश के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार की चुनाव आयोग पर की गई एक खोजी रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में भूचाल आया हुआ है।
यह भूचाल इस तरह आया है कि विपक्षी दलों ने बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली तथा मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे कई अन्य राज्यों में हुए चुनावों को निरस्त करने की मांग की है।
विपक्षी दल इस बार आर-पार के मूड में दिखाई दे रहे हैं और हो सकता है कि आने वाले कुछ दिनों में वे देशव्यापी आंदोलन की घोषणा भी कर दें।
सिर्फ विपक्षी नेता ही नहीं, बल्कि देश के कई पूर्व चुनाव आयुक्तों, जिनमें कम से कम दो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त भी शामिल हैं, ने ज्ञानेश कुमार के कई निर्णयों, जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन भी शामिल है, को गैरकानूनी बताया है।
भारत में हर चुनाव के दौरान या चुनाव से पहले और बाद में कई तरह के विवाद सामने आते ही रहते हैं, लेकिन यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है जब चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर इतने बड़े पैमाने पर विवाद सामने आया है।
अखबार की इस खोजी रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार दोनों चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों या आदेशों पर या तो लिखित आपत्ति दर्ज कराई या उन्हें अपनी नोटशीट में अनधिकृत अथवा गैरकानूनी बताया।
एसआईआर (SIR) के अलावा सबसे गंभीर मुद्दा चुनाव आयोग के फॉर्म 6 में किया गया बदलाव है। फॉर्म 6 वही फॉर्म है जिसके माध्यम से मतदाता सूची में नए मतदाताओं को जोड़ा जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में इस फॉर्म में एसआईआर से जुड़ा एक नया सवाल जोड़ा गया। इस सवाल के अनुसार आवेदक को यह बताना था कि उसका नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था या नहीं, अथवा उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उसमें था या नहीं, या किसी अन्य संबंधी का नाम उसमें दर्ज था या नहीं।
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने फॉर्म 6 में इस तरह के बदलाव पर आपत्ति करते हुए कहा था कि संबंधित कानून में संशोधन किए बिना आयोग द्वारा फॉर्म में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता।
ज्ञातव्य है कि किसी भी कानून में बदलाव करने का अधिकार संसद के क्षेत्राधिकार में है, न कि चुनाव आयोग के। इस आपत्ति के बावजूद फॉर्म 6 में बदलाव कर दिया गया।
एसआईआर को लेकर पहले से ही देश में चारों तरफ विवाद है, क्योंकि विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर ऐसे लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए शुरू किया गया है, जो भाजपा को वोट नहीं देते हैं और ज्ञानेश कुमार ही इस एसआईआर के मुख्य वास्तुकार हैं।
दरअसल, कानून के अनुसार चुनाव आयोग में कोई भी निर्णय या तो मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दो अन्य चुनाव आयुक्तों की पूर्ण सहमति से होता है या बहुमत के आधार पर। अत: किसी भी निर्णय के पीछे तीन आयुक्तों में से कम से कम दो की सहमति आवश्यक है और यह बैठक में तय होता है।
लेकिन अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ फॉर्म 6 ही नहीं, एसआईआर से संबंधित कई निर्णयों तथा मतदाताओं के डेटाबेस तक पहुंच को लेकर भी ऐसे कई फैसले हुए, जिन पर इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज कराई थी।
इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने इस बात पर भी आपत्ति उठाई कि उनकी जानकारी के बिना चुनाव आयोग की ओर से पत्र और आदेश जारी किए जा रहे थे।
फॉर्म 6 की ही तरह मतदाता डेटाबेस तक पहुंच के मामले में भी इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई।
दरअसल, मतदाता सूची में किसी नए मतदाता का नाम जोड़ना या किसी मतदाता का नाम हटाना, यह अधिकार केवल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अफसर (Electoral Registration Officer) के पास होता है। यह अधिकार मुख्य चुनाव आयुक्त या किसी अन्य अधिकारी के पास भी नहीं है।
लेकिन यह देखा गया कि पूरे देश में मतदाता डेटाबेस तक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अफसर की पहुंच को ब्लॉक कर दिया गया और केंद्रीय स्तर पर मतदाता सूचियों में नाम जोड़े या हटाए जाने लगे। यह नियमों के विरुद्ध था।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के मनमाने निर्णयों के खिलाफ कैबिनेट सचिव से भी शिकायत की, लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने मीडिया से बातचीत में कहा कि चुनाव आयोग का वर्तमान रवैया बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के इतिहास में एकतरफा निर्णय कभी नहीं लिए गए। जिस तरीके से चुनाव आयोग ने एक ‘फ्रैंकेंस्टीन’ पैदा किया है, उससे देश के हर मतदाता के मन में देश में हो रहे चुनावों की विश्वसनीयता को लेकर भय समा गया है।







