रंजन श्रीवास्तव

देश के कई राज्यों में, कई जगहों पर, अलग-अलग स्कूलों के बच्चे लगभग एक ही समय में शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं.
2010 से 2024-25 के बीच पैदा हुए बच्चों को जेन अल्फा (Gen Alpha) कहिए या कोई भी फैंसी टैग दे दीजिए, इन बच्चों ने, जिनमें छात्र और छात्राएं दोनों शामिल हैं, देश के कई हिस्सों में सड़कों पर उतरकर सिर्फ अपना गुस्सा ही जाहिर नहीं किया है, बल्कि विधायिका, सरकार, कार्यपालिका और यहां तक कि मीडिया को भी आईना दिखा दिया है.
जब देश अपनी आजादी की 80वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रहा था, तब राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहां सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति अब भी चिंता का विषय है.
एक ताजा मामला मध्य प्रदेश के उज्जैन का है, जो मुख्यमंत्री मोहन यादव का गृह जिला भी है.
महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सराफा की छात्राओं ने 14 अगस्त को कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर अपना विरोध दर्ज कराया. उनका गुस्सा इस बात को लेकर था कि जिला प्रशासन उनके स्कूल का करीब 12 किलोमीटर दूर दाउदखेड़ी स्थित सांदीपनि स्कूल में विलय किया जा रहा था.
जाहिर है, स्कूल इतनी दूर शिफ्ट होने का सीधा असर छात्राओं की पढ़ाई पर पड़ता. उन्हें रोजाना करीब 12 किलोमीटर दूर आने-जाने की परेशानी भी उठानी पड़ती.
छात्राओं का गुस्सा इतना बढ़ गया कि उन्होंने साफ कहा कि कलेक्टर खुद उनके बीच आएं, उनकी बात सुनें और समस्या का समाधान करें.
आखिरकार 18 अगस्त को कलेक्टर, स्थानीय विधायक और सांसद छात्राओं के स्कूल पहुंचे. उन्हें आश्वासन दिया गया कि जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती, स्कूल को शिफ्ट नहीं किया जाएगा.
इस सिलसिले की शुरुआत पिछले महीने राजस्थान के बाड़मेर से हुई थी. वहां एक सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय के छात्रों ने स्कूल के गेट पर ताला लगाकर धरना शुरू कर दिया.
सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारे लगाते हुए छात्रों की मांग थी कि स्कूल में खाली पड़े विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के पदों को भरा जाए.
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में भी छात्रों ने स्कूल में बिजली के पंखे, पानी, शौचालय, फर्नीचर और लैब जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया.
बिहार के गया में भी एक स्कूल के बच्चों का प्रदर्शन लगभग इन्हीं बुनियादी सुविधाओं को लेकर था.
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में छात्रों ने स्कूल की मेस में खराब खाना मिलने और खेल की सुविधाओं की कमी के खिलाफ आवाज उठाई.
महाराष्ट्र के पालघर में छात्रों ने स्कूल में शौचालय और पानी की व्यवस्था नहीं होने तथा शिक्षकों की कमी को लेकर विरोध दर्ज कराया.
ऐसे प्रदर्शन इन राज्यों में कई और जगहों पर भी देखने को मिले हैं.
कहीं बच्चे बरसात में स्कूल पहुंचने के लिए सड़क की मांग कर रहे हैं, तो कहीं वे स्कूल तक पहुंचने वाली कीचड़ और गड्ढों से भरी सड़कों का वीडियो खुद बना रहे हैं.
इन वीडियो में कई बच्चे खुद मीडिया रिपोर्टर बन जाते हैं. कैमरा हाथ में लेकर वे सड़क की हालत दिखाते हैं, कमेंट्री करते हैं और अपने वीडियो सोशल मीडिया पर डाल देते हैं.
इन बच्चों का संदेश बेहद साफ है. जब हमारी बात कोई नहीं सुन रहा, तो हम खुद अपनी आवाज बनेंगे.
इन बच्चों की आवाज को चाहे जिस नजरिए से देखा जाए, उनकी मांग बेहद सीधी और सपाट है.
वे न सरकार गिराने की मांग कर रहे हैं, न किसी मंत्री के इस्तीफे की और न किसी अधिकारी को हटाने की.
वे सिर्फ अच्छी शिक्षा चाहते हैं. वे चाहते हैं कि उनके स्कूल में शिक्षक हों, पीने का पानी हो, शौचालय हो, बिजली हो, लैब हो, खेल की सुविधा हो और स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क हो.
यानी वे वही मांग रहे हैं जिसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें हर साल शिक्षा के नाम पर लाखों करोड़ रुपये का बजट आवंटित करती हैं.
फिर सवाल यह है कि बजट बनने और पैसा खर्च होने के बावजूद गांवों और कस्बों के सरकारी स्कूलों की हालत क्यों नहीं बदल रही?
यह भी कहा जा सकता है कि जेन जी (Gen Z) के आंदोलनों, खासकर जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों के बाद जेन अल्फा के आंदोलनों ने रफ्तार पकड़ी है. इसमें सोशल मीडिया ने उत्प्रेरक का काम किया है.
ऐसा नहीं है कि भारत में जेन अल्फा के बच्चों ने इससे पहले कभी अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन नहीं किया. फर्क यह है कि ऐसे आंदोलन आम तौर पर किसी एक स्कूल या किसी एक इलाके तक सीमित रह जाते थे.
आज जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह अलग है.
भारत में पहली बार इतने कम समय में कई राज्यों और कई इलाकों में स्कूलों की बदहाली के खिलाफ जेन अल्फा के बच्चे एक साथ सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं. कहीं शिक्षक चाहिए, कहीं पानी और शौचालय, कहीं बिजली और लैब, कहीं खराब खाना और कहीं स्कूल तक पहुंचने के लिए सड़क.
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सिलसिला अभी थमा नहीं है.
अलग-अलग राज्यों से आ रही इन बच्चों की आवाज का एक जैसा होना महज संयोग नहीं माना जा सकता. उनकी मांगें जायज हैं और उनका तरीका भी एक बड़ा संदेश दे रहा है.
यह संदेश सरकार और प्रशासन दोनों के लिए है.
देश की मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के लाखों बच्चे अब शिक्षा व्यवस्था की बदहाली को चुपचाप स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं.
जेन अल्फा शायद अभी वोट नहीं दे सकती. लेकिन वह अपनी आवाज उठाना सीख चुका है.







