TIO नई दिल्ली

-इंटरनेशनल ट्रेड हब्स से तेल खरीदता है भारत, न कि सीधे रूसी सरकारी संस्थानों से
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत पर रूस की आर्थिक मदद करने का आरोप लगाते हुए टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी दी है। उन्होंने दावा किया कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद से यूक्रेन युद्ध को बढ़ावा मिल रहा है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सच्चाई तो यह है कि भारत नहीं, बल्कि पश्चिमी देश ही रूस की आर्थिक रीढ़ बने हुए हैं।
पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं, बल्कि प्राइस कैप प्रणाली लागू की है। भारत इस लिमिट के तहत ही तेल खरीदता है—पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी तरीके से। जब भारत नियमों के तहत व्यापार कर रहा है, तो केवल उसी को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? इसका सीधा जवाब है—भूराजनीतिक ईर्ष्या। भारत का बढ़ता वैश्विक प्रभाव कुछ देशों को पच नहीं रहा है। चीन (47 फीसदी), भारत (38फीसदी), और यूरोपीय संघ व तुर्की (6फीसदी) ये हैं रूस के सबसे बड़े ग्राहक। अकेले भारत को दोषी ठहराना तथ्यों से परे है।
बता दें यूरोपीय संघ खुद जून 2025 में 1.2 अरब डॉलर की रूसी गैस खरीद चुका है। टॉप पर हैं फ्रांस, हंगरी, नीदरलैंड, स्लोवाकिया। भारत रूसी रिफाइंड ईंधन नहीं खरीदता। लेकिन नाटो सदस्य चीन, ब्राजील, तुर्की जैसे देश बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं। भारत इंटरनेशनल ट्रेड हब्स से तेल खरीदता है, न कि सीधे रूसी सरकारी संस्थानों से। सभी लेनदेन नियमों के दायरे में होते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत के बाजार से हटने पर तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। भारत दुनिया को स्थिरता दे रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्री, ऊर्जा सलाहकार और राजदूतों ने खुद माना है कि भारत की रणनीति ने ग्लोबल इकोनॉमी को बचाया है। यूरोपीय संघ के देश अब भी पाइपलाइन से रूसी तेल ले रहे हैं। जापान को 2026 तक छूट, और अमेरिका समेत कई देशों पर कोई प्रतिबंध नहीं। ट्रंप के बयान भ्रामक हैं। भारत नियमों का पालन करते हुए वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता में अहम भूमिका निभा रहा है। जबकि पश्चिमी देश खुद भी रूस से व्यापार कर रहे हैं, लेकिन दोष भारत पर मढ़ा रहे हैं।

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER