शशी कुमार केसवानी
पिछले 6 दिनों से भारत के एयरपोर्ट पर हाहाकार मचा हुआ है। इंडिगो का टिकट कटाने वाले हज़ारों यात्री परेशान हैं। उनकी उड़ानें रद्द हो रही हैं। बीस बीस घंटे की देरी से जहाज़ उड़ रहे हैं लेकिन इन चार दिनों में सरकार एयर लाइन कंपनी पर लगाम नहीं लगा सकी। लोगों का कितना कुछ बर्बाद हुआ। इस दौरान दूसरी कंपनियों ने किराया बढ़ा कर लूटा है। यह सब लोगों के सामने हुआ और अंत में ष्ठत्रष्ट्र को ही पीछे हटना पड़ा। क्या जिस सरकार पर जनता की मांगों का असर नहीं होता वह सरकार एक कंपनी के आगे इस तरह झुकेगी?
आप तमाशा देखते देखते, ख़ुद तमाशा बन गए, कैसे हुआ यह सब। जनवरी 2024 को नए नियम लागू होने थे पर इंडिगो की दादागिरी के आगे सरकार को झुकना पड़ा अब सरकार ने वीकली रेस्ट के बदले कोई भी छुट्टी नहीं देने के फैसले को वापस ले लिया। इंडिगो का दावा है कि इस नियम की वजह से पायलटों और अन्य स्टाफ की कमी हुई थी और पूरा ऑपरेशन प्रभावित हुआ। इसे दुरुस्त करने समय लगेगा। ष्ठत्रष्ट्र ने 1 नवंबर से पायलटों और अन्य क्रू मेंबर्स के काम से जुड़े नियम, फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (स्नष्ठञ्जरु) का दूसरा फेज लागू किया था। पहला चरण 1 जुलाई को लागू हुआ था। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने एयलाइंस, खासकर इंडिगो को 10 फरवरी 2026 तक अस्थायी राहत दी है। लेकिन इस दौरान लोगों का जो नुकसान हुआ है उसकी भइपाई कौन करेगा। जबकि इंडिगो को सारे नियमों की जानकारी पहले से थी। जानबूझकर नए स्टॉफ और पायलटों की नियुक्ति नहीं की। साथ ही साथ ग्राउंंड स्टाफ की कमी भी जानबूझकर की गई जिसका खामियाजा आम पब्लिक को चौबीसों घंटों तक एयरपोर्ट पर भूखे-प्यासे रहकर परेशानियों से लडऩा पड़ा और अपनी वीडियो बना कर लोगों को बताने की जरूरत पड़ी। जबकि जरूरत थी मीडिया इस पर नजर रखें। इंडिगो की उड़ानें रद्द होने पर हवाई अड्डों पर जो हाहाकार मचा है उसकी मीडिया में किस तरह से रिपोर्टिंग हो रही है, क्या आपने नोट किया? इस ख़बर को समझने के लिए जब हमने मीडिया में ख़बरों को पलटना शुरू किया तब यात्रियों की परेशानियों और असल कहानी को ग़ायब पाया। ख़बर क्या थी उसे जानने के लिए हमें ढाई साल पीछे तक की रिपोर्टिंग को खंगालना पड़ा। ज़ाहिर है आम दर्शक और पाठक के लिए यह कर पाना संभव नहीं है। मगर सवाल है कि इतने बड़े संकट की रिपोर्टिंग क्यों नहीं हुई? क्यों इस ख़बर के मूल सवाल सुर्खियों से ग़ायब हैं?
यह होती है कार्पोरेट की पावर। देश की सबसे बिगड़ैल एयरलाइंस के आगे मोदी सरकार ने सिर नवा दिया है। यकीनन इंडिगो के लिए पायलटों के रोस्टर के नए नियमों को वापस लेने का मतलब देश की जनता की जान को खतरे में डालना है। यह सुरक्षा से समझौता है।
जब देश में 70 फीसदी किसी एक कंपनी का वर्चस्व होगा तो वो जब चाहेगी सरकार को और जनता को रोड पर खड़ा कर देगी। इस समय इंडिगो की 70 फीसदी उड़ाने होती है और 30 प्रतिशत एयर इंडिया की जबकि पूरी दुनिया में न जाने कितनी एयरलाइन्स कंपनियां लांच होती जा रही है और किराया भी सस्ता हो रहा है। पर भारत में एयरलाइन कंपनियों की मनमानी से लोगों को जो परेशानी हो रही है सरकारें आंखें और कान बंद करके बैठी है। केवल एक मंत्री कंट्रोल रूप में जाकर बैठता है और वो कंट्रोल रूम भी ऐसा लगता है कि वो कंट्रोल रूप किसी पंचायत का आफिस हो। केवल जहां पर टेबल कुर्सिया होती है। हवाई यात्रा करने वाले लोगों को यह बात समझ में आ गई होगी कि हर बात चुपचाप सहने से नतीजें खराब होते है। पहले 25 किलो सामान लेने की इजाजत थी जिसे घटाकर 15 किलो कर दिया गया।
कंपनी का प्रॉफिट बढ़ाने के लिए ऐसे कई कानून बनाती रहती है कंपनियां । कहां सरकार का दावा था कि स्लीपर पहनने वाला व्यक्ति भी हवाई यात्रा कर पाएगा। हालात यह हो गए है सूट पहनने वाले व्यक्ति को भी हवाई यात्रा करने में पसीना आ जाता है। इंडिगो ने लोगों से माफी मांगी है क्या केवल माफी मांगने से सारी भरपाई हो जाएगी? लोगों को अपनी ही शादी का रिसेप्शन ऑनलाइन अटेंन्ड करना पड़ा। और इंडिगो के ग्राउंड स्टॉफ को लोगों का गुस्सा झेलना पड़ा और हायर अॅथारिटी अपने ऑफिस में बैठकर नई प्लानिंग रचती रही। सरकार आखिर पायलटों से क्यों काम पर वापस लौटने के लिए क्यों अपील कर रही है जबकि सरकार एक कंपनी के आगे गिड़गिड़ाती हुई नजर आ रही है।







