TIO पटना

सुप्रीम कोर्ट में बिहार में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR (सामान्य शब्दों में वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन) पर गुरुवार को तीसरे दिन भी सुनवाई होगी।

12 अगस्त को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने SIR को वोटर फ्रेंडली बताया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने 11 में से कोई एक डॉक्यूमेंट मांगा है। शीर्ष कोर्ट ने ये भी कहा-

SIR में 11 दस्तावेज मांगे गए हैं, जबकि राज्य में पहले किए गए छोटे से वोटर रिवीजन में 7 डॉक्यूमेंट्स मांगे गए थे। याचिकाकर्ताओं के इस तर्क के बावजूद कि आधार को स्वीकार न करना लिस्ट से बाहर करने जैसा रवैया था। लेकिन इसमें दस्तावेजों की बड़ी संख्या (11) का मकसद लोगों को लिस्ट में रखना है।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी ने मांगे गए दस्तावेजों की संख्या से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि बिहार में 1-2% लोगों के पास स्थायी निवास प्रमाणपत्र होगा। अगर राज्य में जनसंख्या के आधार पर डॉक्यूमेंट्स की उपलब्धता की बात करें तो यह काफी कम है।

वहीं प्रशांत भूषण ने कहा कि लगभग 8 करोड़ मतदाता हैं। मैं गारंटी दे सकता हूं कि जिन लोगों के गणना फॉर्म प्राप्त हुए हैं, उनमें से 25% से अधिक लोगों ने एक भी दस्तावेज नहीं दिया है। BLO ने गणना फॉर्म भर दिए हैं और उन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ये 11 दस्तावेज नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं।

भूषण ने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों के पास एक भी दस्तावेज नहीं है। लगभग 40% लोगों के पास केवल मेट्रिकुलेशन का प्रमाणपत्र है, लेकिन कुल मिलाकर 50 फीसदी से ज्यादा लोगों के पास एक भी दस्तावेज नहीं है।

मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच में सुनवाई चल रही है।

कोर्ट ने ये भी कहा,

राज्य में 36 लाख लोगों के पास पासपोर्ट है। इसे अच्छी संख्या कहा जा सकता है। बिहार को इस तरह पेश न करें। अखिल भारतीय सेवाओं में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व इसी राज्य से है। ज्यादातर आईएएस, आईपीएस, आईएफएस यहीं से हैं। अगर युवा आबादी प्रेरित नहीं होगी तो यह संभव नहीं हो सकता।

बेघर लोगों का निवास स्थान किस आधार पर तय किया जाएगा

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को मतदाता सूची में संशोधन प्रक्रिया को लेकर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जे. कांत ने कहा कि यह देखा जाएगा कि चुनाव आयोग ने किन बिंदुओं को स्वीकार किया है और किन्हें नहीं, जब उनसे सवाल पूछे जाएंगे।

वरिष्ठ अधिवक्ता सेन ने दलील दी कि, यदि चुनाव आयोग यह कह रहा है कि मतदाता सूची में बदलाव हुआ है, तो इसके लिए घर-घर जाकर नामांकन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी होते हैं, ऐसे में बूथ लेवल एजेंट (BLA) और स्वयंसेवकों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। सेन ने सवाल उठाया कि बेघर लोगों का निवास स्थान किस आधार पर तय किया जाएगा। उनके अनुसार, इसके लिए रात में कम से कम दो बार दौरे किए जाने चाहिए।

इस पर न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि ये व्यावहारिक चुनौतियां हैं, लेकिन समाधान निकालने का तरीका भी किसी को खोजना होगा। उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि इसका कोई समाधान नहीं है।’

सेन ने आगे तर्क दिया कि मौजूदा परिस्थितियों और समय की कमी को देखते हुए यह प्रक्रिया उचित नहीं कही जा सकती। उन्होंने कहा कि मतदाता सूचियां वर्षों से मौजूद हैं और “संतुलन सुविधा के लिहाज से मेरे पक्ष में है।’

सुनवाई के दौरान अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 21(3) का भी जिक्र किया और पूछा कि क्या चुनाव आयोग के पास विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision) के लिए अवशिष्ट शक्तियां (Residual Power) नहीं हैं। इस मामले में कल फिर सुनवाई होगी।

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER