TIO भोपाल

प्रख्यात लेखक, शिक्षक और कवि डॉ. शिलादित्य वर्मा की बहुप्रतीक्षित चौथी पुस्तक “सोलमैट्स – शंकरागढ़ डायरीज़ 2” का भव्य विमोचन आज भोपाल स्थित दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में सम्पन्न हुआ। इस साहित्यिक अवसर पर दे शहरभर से साहित्यकार, कला प्रेमी, रंगकर्मी और पाठक एकत्रित हुए और कार्यक्रम की गरिमा को नई ऊँचाइयाँ दीं।
इंद्रा पब्लिकेशन्स, भोपाल द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास का लोकार्पण साहित्य और संस्कृति की अनेक नामचीन हस्तियों के कर-कमलों से हुआ। गणमान्य साहित्यकारों में शामिल रहे: श्री गिरिजाशंकर, श्री विजयदत्त श्रीधर, श्री ज्ञान चतुर्वेदी, श्री विजय मनोहर तिवारी, श्री विकास दवे एवं श्री संतोष चौबे। कार्यक्रम का कुशल संचालन भोपाल के वरिष्ठ सांस्कृतिक विश्लेषक श्री विनय उपाध्याय ने आत्मीयता और गरिमा के साथ किया, जिससे संपूर्ण आयोजन में साहित्यिक सरसता बनी रही।
समारोह का शुभारंभ चाय-सत्र से हुआ, जिसके पश्चात अतिथियों का मंच पर स्वागत और अतिथियों को हरित-स्मृति के रूप में पौध-प्रस्तुति की गई। स्वागत भाषण श्रीमती रीता वर्मा द्वारा दिया गया। इसके बाद लेखक डॉ. शिलादित्य वर्मा ने पुस्तक की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा:
“2018 में जब ‘शंकरागढ़ डायरीज़ 1’ में ‘सोलमैट्स’ एक शार्ट स्टोरी के रूप में प्रकाशित हुई थी, तब कई पाठकों ने हर्ष और अपर्णा के आगे की कहानी जानने की उत्सुकता जताई। इस छोटी कहानी को एक संपूर्ण उपन्यास में बदलने में कई साल लगे – और इस यात्रा में मैं भी बदला, मेरी सोच और लेखन शैली भी। ‘शंकरागढ़’ मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि जीवंत अनुभवों की दुनिया है – जहां हर चेहरे के पीछे एक कहानी छिपी है।”


सभी गणमान्य साहित्यकारों ने इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह उपन्यास आज के समय में छोटे शहरों की संस्कृति, प्रेम और संवेदनाओं को बड़ी सजीवता से प्रस्तुत करता है और समकालीन हिन्दी कथा साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
सभी विद्वानों और साहित्यकारों ने ‘सोलमैट्स – शंकरागढ़ डायरीज़ 2’ को लेकर अपने-अपने विचार साझा किए, और लेखक डॉ. शिलादित्य वर्मा की लेखनी की विशेषताओं की भूरी-भूरी प्रशंसा की।
श्री गिरिजाशंकर ने कहा कि यह उपन्यास छोटे शहरों की भावनात्मक जटिलताओं को सजीव रूप से प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार, लेखक की संवेदनशीलता अत्यंत प्रशंसनीय है और पात्रों के भीतरी संसार को समझने की उनकी दृष्टि उल्लेखनीय है।
श्री विजयदत्त श्रीधर ने टिप्पणी की कि शिलादित्य वर्मा की लेखनी में गहरी अंतर्दृष्टि है, जो समकालीन हिन्दी साहित्य को नई दिशा देती है। उन्होंने यह भी कहा कि लेखन अत्यंत सराहनीय है — भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है, और प्रसंगों व पात्रों के अनुरूप शब्दों का चयन अत्यंत प्रभावी है। उन्होंने इस बात पर विशेष रूप से बल दिया कि उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसका शिल्प है — जैसे किसी डायरी के पन्ने पलटे जा रहे हों। एक ही दिन या परिस्थिति पर दो पात्रों की अलग-अलग सोच, अनुभूति और प्रतिक्रिया को सामने लाना — यह एक अनूठा साहित्यिक प्रयोग है, जो अत्यंत सराहनीय है।
श्री ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने चिर-परिचित हँसी-मज़ाक के अंदाज़ में कहा कि “हर्ष और अपर्णा की कहानी में उतना ही ड्रामा है जितना किसी अच्छे उपन्यास को चाहिए, और उतनी ही सच्चाई भी। यह कहानी हमें हँसाती भी है और भीतर कहीं छू भी जाती है।”
श्री विजय मनोहर तिवारी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि “शंकरागढ़ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि संवेदना और स्मृतियों का विस्तार है — और लेखक ने उसे पूरी तरह जीवंत कर दिया है। पाठक उसमें न केवल स्थान, बल्कि अपनी भावनाएँ भी देखता है।”
श्री विकास दवे ने कहा कि “नवलेखन में पारिवारिक, स्थानीय और सांस्कृतिक सन्दर्भों को जोड़ना जितना कठिन होता है, उतनी ही सहजता से यह उपन्यास उस संतुलन को साध लेता है। इसे पढ़ते हुए हमें हमारी ही ज़मीन की खुशबू महसूस होती है।”
श्री संतोष चौबे ने कहा कि “शिलादित्य जैसे युवा लेखक हिन्दी साहित्य में नई उम्मीद की तरह हैं, जो परंपरा और नवाचार के बीच संतुलन बना रहे हैं। उनका लेखन न केवल भावनात्मक रूप से गहन है, बल्कि रचनात्मक रूप से भी प्रयोगशील है।”
श्री राजीव वर्मा ने कहा कि यह पुस्तक न केवल भारत के विभिन्न छोटे शहरों में रहने वाले लोगों के दैनिक जीवन को उजागर करती है, बल्कि लंदन जैसे महानगरों में रहने वाले प्रवासियों की जटिलताओं और भावनात्मक संतुलनों को भी गहराई से समझाती है। यह दर्शाती है कि कैसे दो अलग-अलग संस्कृतियों की श्रेष्ठताओं को आत्मसात करते हुए एक व्यक्ति अपनी पहचान और मूल्यों को बनाए रख सकता है।
श्रीमती रीता वर्मा ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि यह पुस्तक केवल एक कथा नहीं, बल्कि लेखक की पारिवारिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जड़ों का सजीव प्रतिबिंब है। एक माँ के नज़रिये से यह क्षण गर्व से भरा हुआ है — क्योंकि यह पुस्तक न केवल साहित्यिक उपलब्धि है, बल्कि आत्म-अन्वेषण की एक गहन यात्रा भी है।
इस अवसर पर यह भी रेखांकित किया गया कि ‘सोलमैट्स – शंकरागढ़ डायरीज़ 2’ अपने ढंग का एक विशिष्ट प्रयोग है — जहाँ एक ही दिन या परिस्थिति को दो पात्रों की दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है। यह शैली न केवल पठनीयता को बढ़ाती है, बल्कि पाठक को हर पात्र की मनोस्थिति में गहराई से उतरने का अवसर भी देती है — और यही इसे एक सशक्त और नवोन्मेषी उपन्यास बनाता है।
समारोह के अंत में सभागार में उपस्थित अन्य गणमान्य अतिथि साहित्यकारों का सम्मान एवं पौध-प्रस्तुति किया गया। अंत में श्री मनीष गुप्ता, प्रबंध निदेशक, इंद्रा पब्लिकेशन्स, भोपाल ने सभी अतिथियों, सहभागियों और पाठकों के प्रति आभार प्रकट किया।
डॉ. शिलादित्य वर्मा, मूलतः भोपाल निवासी हैं और पिछले दस वर्षों से संयुक्त अरब अमीरात के फुजैरा स्थित हायर कॉलेजेस ऑफ़ टेक्नोलॉजी में बिज़नेस डिवीजन के फैकल्टी सदस्य हैं। वे प्रसिद्ध रंगकर्मी, फ़िल्म व टेलीविज़न अभिनेता-निर्देशक श्री राजीव वर्मा के पुत्र हैं।
उनकी अंग्रेज़ी पुस्तक “ड्रीम्स शुड बी ड्रीम्स: पोयम्स एंड शार्ट स्टोरीज़” को हाल ही में इंटरनेशनल ऑथर एक्सीलेंस अवार्ड 2025 से नवाज़ा गया, जो दुबई में गोल्डन अवार्ड्स द्वारा प्रदान किया गया।
डॉ. शिलादित्य वर्मा एक बहुभाषी लेखक, कवि और रंगकर्मी हैं। उनकी अन्य प्रकाशित कृतियाँ हैं — ड्रीम्स शुड बी ड्रीम्स: पोयम्स एंड शार्ट स्टोरीज़ (2022 | अंग्रेज़ी), शंकरागढ़ डायरीज़ 1 (2018 | हिन्दी), किस्से-कहानियाँ भी कैसा मज़ाक करते हैं (2017 | हिन्दी एवं अंग्रेज़ी कविता संकलन)
यह आयोजन केवल एक साहित्यिक विमोचन नहीं, बल्कि हिन्दी लेखन में प्रेम, स्मृति और संबंधों की गहराइयों को छूने वाली रचना यात्रा का उत्सव था।
प्रकाशक: इंद्रा पब्लिकेशन्स, भोपाल
लेखक से संपर्क: shilaverma@gmail.com, +919826030119

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER