Double standards of big countries on terrorism
राजेश बादल
पहलगाम में भारतीय पर्यटकों का सामूहिक संहार अब आतंकवादी हमला नहीं कहा जा सकता।यह अघोषित युद्ध ही था।संसद के दोनों सदनों में दो दिन में सोलह घंटे तक गंभीर बहस से यह स्वीकार कर लेना चाहिए।सभी दलों के सांसदों ने जिस तरह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस जघन्य वारदात से जुड़े तथ्यों को पटल पर रखा,उससे यह भी उजागर हो गया कि विकसित और अमीर देश आतंकवाद को लेकर नज़रिया बदल चुके हैं।अब वैश्विक स्तर पर दहशतगर्दी की सर्वमान्य परिभाषा का कोई एक प्रामाणिक संस्करण नहीं हो सकता।जो राष्ट्र कभी आतंकवादी वारदातों की खुलकर निंदा करते थे,वे अब आतंकवाद को संरक्षण देने वाले देशों के साथ दावतें उड़ाते हैं।पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ख़ान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रसभरी मुलाक़ात इसका सबसे बड़ा सुबूत है। पाकिस्तान,चीन और अन्य देशों के रवैए में आया परिवर्तन अपने आप में इसका प्रमाण है।अंतररष्ट्रीय शिखर संस्थाओं के व्यवहार में भी ऐसा ही बदलाव देखा जा रहा है।
पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष सार्वजनिक मंचों से यह राग बार बार अलापते हैं कि कश्मीर में जो चल रहा है,उसे उनका देश समर्थन देता रहेगा तो यह खुले आम आतंकवाद को संरक्षण देना ही है।मुनीर साफ़ कहते हैं कि वे कश्मीर को भारत से मुक्त कराने के लिए आतंकी संगठनों को समर्थन जारी रखेंगे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे अब उन आतंकी अड्डों को फिर से जीवित करने का काम करेंगे।
दूसरी तरफ भारत दशकों से तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष में एकजुट होने की अपील करता रहा है। भारत में सीमापार से आतंकवादी हमलों के लिए लंबे समय तक विश्व के अनेक महत्वपूर्ण देश भारत के रुख़ का समर्थन करते नज़र आते थे। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है।जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने शंघाई सहयोग परिषद के साझा बयान पर दस्तख़त करने से इनकार किया था तो साफ़ था कि भारत चाहता था कि साझा बयान में पहलगाम वारदात की निंदा हो और आतंकवाद को संरक्षण देने वाले पाकिस्तान को कोसा जाए।ऐसा नहीं हुआ।चीन के दबाव में ऐसा हुआ।चीन क्रूर और हिंसक देश है।वह थियानमन चौक में अपने ही सैकड़ों नौजवानों को गोलियों से भून देता है। दहशतगर्दी से वह अपनी सरकार बचाता है ?
आज भारत में दशकों से जिसे हम नक्सली हिंसा कहते हैं,वह तो चीन की ही देन है।उसे सरकारी भाषा में माओवादी उग्रवाद ही कहते हैं।प्रसंग के तौर पर बता दूँ कि चीन ने तो 1949 से ही अपने आतंकी इरादे साफ़ कर दिए थे।जब वहाँ नई सरकार सत्ता में आई तो भारत ने सहज स्वाभाविक रूप से बधाई भेजी।लेकिन चीन ने इसका उत्तर तक नहीं दिया,उल्टे तेलंगाना में माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी को औपचारिक सन्देश भेजा कि भारत की बुर्जुआ सरकार को हिंसक क्रान्ति के ज़रिए उखाड़ फेंको।चीन ने हथियार दिए,उग्रवादियों को प्रशिक्षण दिया और आर्थिक मदद भी की।जब भारत को चीन के समर्थन से इन आतंकवादी गतिविधियों की ख़बर लगी तो तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारीलाल नंदा ने आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम आपात सन्देश प्रसारित किया और उसमें बताया कि सेना इन आतंकी शिविरों और उग्रवादी ठिकानों को समाप्त करने के लिए कार्रवाई कर रही है। इसके बाद भीषण जंग हुई और भारत के भीतर चल रहे चीन के आतंकी अड्डों को ख़त्म किया गया।
विडंबना है कि भारत के विरोध में अमेरिका और चीन इन दिनों पाकिस्तान तथा बांग्लादेश का इस्तेमाल कर रहे हैं।यह छिपा हुआ नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में अमेरिका की कठपुतली सरकारें काम कर रही हैं।पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अपनी सरकार की बर्ख़ास्तगी के लिए सार्वजनिक रूप से अमेरिका को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद भी अपनी सरकार के तख़्तापलट के पीछे अमेरिका का हाथ बताती रही हैं।क्या मान लिया जाए कि अमेरिका और चीन असल में जैसा एक दूसरे के प्रति सार्वजनिक व्यवहार करते हैं,असल में वैसे नहीं है। स्पष्ट है कि वर्तमान में आतंकवाद की परिभाषा बदल चुकी है।अब तो आतंक फैलाकर देशों में तख़्तापलट भी किया जा रहा है।
यक्ष प्रश्न यही है। एक दौर वह था,जब आतंकवाद की वैश्विक परिभाषा थी।समूचा संसार उस पर एक साथ खड़ा रहता था।अमेरिका पर अल क़ायदा के भीषण हमले और मुंबई में धमाकों की निंदा सारे विश्व ने की थी।पर,अब सब बदल गया है। अब तो देखना होगा कि कौन सा देश आतंकवादी नहीं है।अपने राष्ट्रीय अथवा व्यक्तिगत हितों की ख़ातिर अधिकतर देशों के राष्ट्राध्यक्ष कहीं न कहीं आतंकवाद का सहारा ले रहे हैं।हिन्दुस्तान को गंभीर विचार की आवश्यकता है कि उसे वैश्विक समुदाय से आतंकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष की बार बार अपील क्यों करना चाहिए ?अब तो उसे सीधी कार्रवाई करना ही चाहिए।इसके लिए विश्व के किसी देश का प्रमाणपत्र ज़रुरी नहीं है।
अब तो अमेरिका और चीन समेत बड़े,सभ्य,आधुनिक और अमीर देश आतंकवाद की वैसी निंदा नहीं करते।बल्कि उस हिंसा में कहीं न कहीं स्वयं शामिल हो जाते हैं।कोई देश अपने नागरिकों को ही आतंकित कर रहा है तो कोई मुल्क़ अपना रौब ग़ालिब करने के लिए धड़ल्ले से उग्रवाद का सहारा ले रहा है।इज़रायल भय से ग्रसित है कि ईरान परमाणु बम नहीं बना ले इसलिए वह उस पर हमला करता है।क्या वह आतंकवादी हमला नहीं था ? अमेरिका ईरान पर भयानक आक्रमण करता है।उसके परमाणु संयंत्रों को निशाना बनाता है।क्या वह उग्रवादी गतिविधि नही है ? इस आतंकी हमले के बाद वह डराकर युद्ध विराम भी कराता है।क्या यह सब आतंकवाद के उदाहरण नहीं माने जाने चाहिए ? रूस और यूक्रेन के बीच तीन साल से भी अधिक समय जंग चल रही है।यूक्रेन नाटो की गोद में बैठना चाहता है,क्योंकि उसे रूस से भय है कि कहीं रूस यूक्रेन पर क़ब्ज़ा न कर ले।उधर रूस नाटो सेना से भयभीत है कि कहीं वह यूक्रेन के रास्ते रूसी सीमा पर नहीं डट जाए।पाकिस्तान भारत का डर दिखाकर अपने नागरिकों को आतंकित करता है।वह बलूचिस्तान में जिस तरह अपने बलूच नागरिकों को मारता है,क्या वह आतंकवाद नहीं है ।बांग्लादेश बनने से पहले पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान में आतंक नहीं फैला रही थी ?आज यही काम बांग्लादेश कर रहा है।उत्तर कोरिया अपने नागरिकों को दहशत में रखता है।कह सकते हैं कि अब सत्ताएँ आतंक को संरक्षण देकर अपनी हुकूमत बचा रही हैं।







