आपकी बात – रंजन श्रीवास्तव

एक गैंगस्टर-नेता के चुनाव प्रचार के दौरान सरेआम हत्या. आरोपी बाहुबली प्रत्याशी बिना किसी चिंता के चुनाव प्रचार करता हुआ. इस तरह लोकतंत्र की सभी बीमारियों — धनबल, बाहुबल, हिंसा और जातिवाद — से ग्रस्त बिहार में चुनाव का आगाज़ हत्या से हो चुका है. इस घटना में आरोपी जेडीयू के मुकामा से प्रत्याशी अनंत सिंह हैं जिनकी, पुलिस के अनुसार, मौजूदगी में जनसुराज पार्टी के लिए प्रचार कर रहे गैंगस्टर-नेता दुलार सिंह की हत्या कर दी गई. और अनंत सिंह को तभी गिरफ्तार किया गया जब मीडिया ने इस हत्या को प्रमुखता से उठाया और सत्ता पक्ष को लगने लगा कि अगर कार्रवाई नहीं की गई तो राजनीतिक रूप से चुनावों में उन्हें नुकसान हो सकता है.
अनंत सिंह सत्ता पक्ष के लाडले प्रत्याशी हैं जिनके खिलाफ पिछले चार दशकों में 50 से अधिक मुकदमे दर्ज हो चुके हैं और उनमें 28 मुकदमे अभी भी लंबित हैं. अपराधों में 7 हत्याओं के मामले और 11 हत्या के प्रयास के मामले हैं. अन्य अपराधों में अपहरण, जबरन वसूली, टॉर्चर करने जैसे गंभीर मामले भी हैं. दुलारचंद का भी आपराधिक इतिहास था. कानून को ठेंगा दिखाने वाले अनंत सिंह को उनके समर्थक “छोटे सरकार” कहकर संबोधित करते हैं. और यह भी क्यों न हो — जब अनेक गंभीर अपराध के मामले दर्ज होने के बाद भी कोई आरोपी चुनाव पर चुनाव लड़ता रहे और जीतकर विधानसभा पहुँचता रहे तो उसे “छोटे सरकार” कहने में क्या बुराई है.
बिहार में इस बार चुनाव दो चरणों में है. पहले चरण के लिए मतदान 121 विधानसभा क्षेत्रों में 6 नवंबर को संपन्न होगा. उसके पूर्व बिहार में लगभग आधा दर्जन हिंसा की घटनाएँ हो चुकी हैं. कोई भी राजनीतिक दल अपवाद नहीं है जिसने आपराधिक इतिहास वाले प्रत्याशियों को चुनाव में उतारा न हो.
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण के 1,303 उम्मीदवारों में से 423 (32%) के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिन्हें उन्होंने चुनाव के समय जमा किए गए अपने शपथ पत्र में स्वीकार किया है. इन प्रत्याशियों में से 354 (27%) पर गंभीर आरोप हैं, जैसे 33 पर हत्या, 86 पर हत्या का प्रयास, और 42 पर महिलाओं के खिलाफ अपराध (जिनमें 2 पर बलात्कार के आरोप हैं).
दूसरे चरण के 1,297 उम्मीदवारों में 415 (32%) पर आपराधिक मामले हैं, और 341 (26%) पर गंभीर मामले. यह आंकड़ा दर्शाता है कि राजनीतिक दल अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को टिकट देकर उनके मसल-पावर का फायदा उठा रहे हैं.
चुनावों में अपराधी तत्वों की भूमिका ने ‘जंगलराज’ की बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है. रोचक यह है कि केन्द्र सरकार में मंत्री ललन सिंह, जो जेडीयू के नेता हैं और बार-बार लालू यादव के राज को ‘जंगल राज’ से संबोधित करते रहे हैं, चुनाव प्रचार के दौरान अपने समर्थकों से यह कहते हुए वीडियो में कैद हो गए कि जो विरोधी हैं उन्हें घर से निकलने नहीं देना है और अगर कोई वोट डालने की जिद करता है तो उसे लेकर मतदान केंद्र पर जाएँ और अपने पक्ष में वोट दिलवा कर उन्हें वापस ले जाकर पुनः उनके घरों में क़ैद कर दें.
ललन सिंह ने इस बात से इनकार किया है कि उन्होंने इस तरह का कोई बयान दिया है पर उनके खिलाफ पुलिस ने इस वीडियो के आधार पर आपराधिक केस दर्ज कर लिए हैं.
ललन सिंह अनंत कुमार की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थन में उनके क्षेत्र में प्रचार करने पहुँचे थे.
राजनीति का यह नंगा सच है कि कोई भी व्यक्ति — चाहे वह प्रदेश या केन्द्र में मंत्री जैसे किसी संवैधानिक पद पर ही क्यों न हो — किसी आपराधिक इतिहास वाले प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने से खुद को कोई गुरेज नहीं रखता है, अगर वह प्रत्याशी उनके दल का है तो.
इस चुनाव में बहुत से व्यक्तियों और राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर है अतः वे आपराधिक इतिहास वाले लोगों को प्रत्याशी बनाकर चुनाव में उतारने से किसी को कोई परहेज़ नहीं. सिर्फ सार्वजनिक मंचों पर आदर्श की बातें की जाती हैं पर चुनाव आते-आते सारे आदर्श चुनाव प्रचार में गुम हो जाते हैं.
बिहार में चुनाव किस माहौल में हो रहा है — इसका अंदाज़ा इस से लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान यह दावा किया कि महागठबंधन के कार्यकर्ताओं ने उनकी रैली को रोकने के लिए हेलीपैड और सभा स्थल तक पहुंचने वाले रास्तों को खोद दिया.
अगर यह सच है तो बहुत ही गंभीर बात है. अगर किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री को चुनाव प्रचार से रोकने के लिए इस तरह का कृत्य हो रहा है तो दूसरे चरण के मतदान से पहले की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.
रहा चुनाव आयोग की बात तो पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग टूथलेस टाइगर की तरह व्यवहार कर रहा है. चुनाव आयोग का पूरा प्रयत्न रहता है कि किसी भी तरह चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाए. चुनाव में हिंसा न हो और उपद्रवी तत्व चुनाव को प्रभावित न करें — इसके लिए चुनाव आयोग सिर्फ खानापूर्ति करता रहा है. बिहार में भी यही हो रहा है.

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER