– शशी कुमार केसवानी

बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि देश की आजादी की जंग में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आजादी की जंग में अपनी जान देने वाले अमर शहीद हेमू कालानी के साथी और उनके उस बलिदानी मिशन में सहभागी रहे लक्ष्मण दास केसवानी राजधानी भोपाल में ही रहते थे। उस जमाने में लक्ष्मण दास के नाम से मशहूर केसवानी जी को दस दिसंबर 1943 को कालापानी अंडमान भेजा गया था, जहां पर उन्होंने काफी कठिनाइयों के बीच सात महीने और एक दिन गुजारे थे। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन लम्हों को याद करते हुए केसवानी जी भावुक हो जाते थे। हारवर्ड यूनिवर्सिटी यूएसए से आए कुछ बच्चे जो भारत की स्वतंत्रता आंदोलन पर रिसर्च कर रहे थे। साथ ही साथ वहां की टीवी के लिए वीडियोग्राफी भी कर रहे थे। उन्हें जानकारी देते हुए लम्हों के साक्षात्कार भोपाल के कुछ पत्रकार भी रहे और हमें भी यह अवसर मिला कि उस समय की पूरी चर्चा सुनी और देखी।
केसवानी जी ने बताया कि वह दौर वाकई दिक्कतों का दौर था, जिसमें हम लोगों को इंकलाबी- कहा जाता था। एक जनवरी 1923 को जैकब आबाद सिंघ (पाकिस्तान) में एक पुलिस अधिकारी के घर पर जन्मे लक्ष्मण दास ने 1940 में सक्खर पाकिस्तान के न्यू माडल हाईस्कूल से मैट्रिक पास की और सक्खर जिले के स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट बने थे। हमारे घर के पास ही कुछ दूरी पर कुछ शेड बने थे, जहां पर अंग्रेज इंजीनियर और उनकी जाति के कई दूसरे लोग रहा करते थे, वहीं पर एक अंग्रेज परिवार मिस्टर जॉनसन और उनकी बहन मैरी जानसन रहते थे। वह सेंट मैरी हाई सेकेंडरी स्कूल में पढ़ते थे, जो केवल अंग्रेजों के लिए ही था।  उस समय टाइम बम हमारे पास नया- नया आया था, लेकिन इससे पहले हमे इस बम के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जिसके कारण हमें विचार करना पड़ रहा था कि हम इसका उपयोग करेंगे कैसे। पर आपसी सलाह से बहुत सारी चींजे तय भी हो गई और हिम्मत भी सबकी बढ़ गई। अब करना है तो बहुत ज्यादा विचार नही करेंगे। अगर जान जाती है तो भी कोई परवाह नहीं। पर यह काम तो करके ही रहेंगे। शायद हमारा यह चीज बिना प्लानिंग के ही बनी थी। समय कम था, साधन भी नहीं थे। हाथों में बम था। बस फिर क्या था। जब एक बार तय कर लिया था तो उसे अंजाम तक पहुंचना ही था। क्योंकि हम कम उम्र के थे। हमसे हमारे वरिष्ठ साथियों ने कहा कि तुम लोग अगर इस टाइम बम को  शेड में रख दो तो उसके विस्फोट से पूरा शेड उड़ जाएगा और अंग्रेज परिवार तबाह होने से अंग्रेजों में खलबली मच जाएगी। इंकलाब का जोश उस समय इतना अधिक था कि हम लोग बिना आगा-पीछा सोच इस काम के लिए तैयार हो गए। मेरे साथ मेरा साथी हस्सू सबनानी भी था। हम लोग जब वहां पर गए तो गार्ड ने हमसे पूछा कि आप लोग कहां जा रहे हो। हमने अपने अंग्रेज मित्र का हवाला दिया कि उससे मिलने जा रहे हैं। इस पर हमसे ज्यादा पूछताछ नहीं की गयी।
भीतर जा कर शेड के पास हमने टाइम बम जो पहले से ही सेट था उसको वहां पर रख दिया। वापसी में मेरे मन में ख्याल आया कि चलो अपने दोस्त जॉनसन से मिलकर चलते हैं। उनके घर जाने पर उसकी बहन जिसे लोग मिस मैरी कहते थे ने कहा कि वह बाहर गए है, लेकिन आप लोग बैठिए। उसने न केवल हम लोगों को बिठाया, बल्कि चाय-पानी को भी पूछा, लेकिन हमारे मन में धक-धक लगी थी और हम वहां से जल्दी ही उठकर बाहर आए। यह संयोग ही कहा जाएगा कि जैसे ही हम लोग गेट तक पहुंचे थे कि बम विस्फोट हो गया। चारों तरफ खलबली मच गयी और मुझे और हस्सू को पकड़ लिया गया। सुनवाई की औपचारिकता के बाद मार्शल कोर्ट ने हमें मौत की सजा सुनाई गई।
तब मार्शल कोर्ट में ज्यादा  बोलने  की नहीं थी आजादी
हमारे पास कोई सुबूत नहीं था कि हम अपने आपको बेगुनाह साबित कर सकें तो कोर्ट में हम लोग अपने आपको  बेगुनाह होने के अलावा कुछ बोल न सके। वैसे भी उस जमाने में मार्सल कोर्ट में कुछ ज्यादा बोलने की आजादी नहीं होती थी।हम लोगों को भी इस बात का अहसास हो गया था कि अब फांसी के फंदे से हमको कोई नहीं बचा सकता है, लेकिन भाग्य ने बड़ा साथ दिया। जब हमारी सजा पर अंतिम मोहर लगायी जानी थी।  पर किस्मत ने हमारा इस तरह से साथ दिया कि वहां पर अचानक माता-पिता के साथ मिस मैरी वहां पर आयी और उन्होंने हमारे पक्ष में यह बयान दिया कि हम लोग उसके भाई के दोस्त है और विस्फोट के समय उसमे मिलने आये थे और उसके घर पर बैठे थे। यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि मैरी के पिता ब्रिटिश साम्राज्य में बड़े अधिकारी थे और उनका रसूख भी बड़ा था। सारे ब्रिटिशर उन्हें जानते थे। उनका कोर्ट में होना अपने आप में ही बहुत अहमियत रख रहा था। हालांकि उन्होंने किसी भी तरह का अल्फाज कोर्ट में नहीं बोला। यह बात अलग है कि मेरे को अपने पुत्र के दोस्त के रूप में जानते थे। मेरे चेहरे की मासूमियत को देखकर अपने पुत्र को हमेशा कहते थे कि यह तुम्हारा मित्र बहुत अच्छा है। शायद यही कारण था कि बड़े पद पर होने के बावजूद कोर्ट चले आए। जिसके कारण हमारी उस समय हम फांसी से तो बच गए, पर मन में एक विचार यह भी था कि हमने किसी का विश्वास तोड़ा है। पर वहीं अपने भारतीयों पर होने वाले अन्यायों को याद करते हुए वह एहसास बहुत छोटा लगने लगा। फिर दिल में एक विचार यह भी आया कि अगर यह बयान किसी भारतीय लड़की का होता तो मार्शल कोर्ट उसको ज्यादा महत्व नहीं देता, बस इसी बात की हमारी लड़ाई थी कि हम अपने देश में दूसरे नंबर के नागरिक बन कर रह गए थे। मार्शल कोर्ट में दो अंग्रेज और दो भारतीय जज थे। उनमें से एक जज जिन्हें कृपलानी साहब के नाम से जाना जा था, उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए लिखा कि अंग्रेज लड़की और ब्रिटिश अधिकारी का कोर्ट में होना अपने आप में यह पर्याप्त सुबूत है कि यह बच्चे इस गुनाह में शामिल नहीं हैं। क्योंकि इनके वहां जाने के बाद यह विस्फोट हुआ है। संदेश के घेरे में यह भी आते हैं पर सुबूत के अभाव में बेगुनाह नहीं माना जा सकता। इस पर पूरी बेंच उनसे सहमत हुई और हमारी सजा को दो साल की सजा में तब्दील कर दिया गया।सफर काले पानी का…  लक्ष्मणदास केसवानी की जुबानी
सुबह-सुबह से मेरा मूड काफी खराब था आखिर हम लोग भी इंसान हैं, कोई भेड़-बकरी तो नहीं, जो जी चाहे करते रहो। यह सब मुझसे सहन नहीं हो पा रहा था। थोड़ी ही देर बाद मैंने देखा कि कुछ सैनिक हमारे कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अभद्र व्यवहार कर रहे थे। फिर क्या था सबसे पहले मैंने ही विरोध किया। उस समय जेलर मार्टिन वहीं पर खड़े थे। मैंरे उनसे कहा यह सब नहीं चलेगा। इस पर वह नाराज हो गए। वैसे भी हिन्दुस्तानी बागियों का ऐतराज उनको अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने मुझसे कहा कि तुमको इस की सजा मिलेगी। थोड़ी ही देर बाद कुछ  सिपाही मेरे पास आए। उन्होंने कहा कि तुमको जेलर साहब बुला रहे है। मैंने कहा कि ऐसी क्या बात है? उन्होंने कहा- चलो तुमको वहीं पता चल जाएगा। जवानी की मस्ती में चूर हम लोगों के ऊपर इंकलाब का नशा काफी चढ़ा था और इसलिए मैंने सोचा कि थोड़ी सी डांट-फटकार  मिलेगी। चलो चलकर देखते हैं, लेकिन वहां पर तो नजारा ही कुछ और था। जेलर मार्टिन मुझको देखते ही बरस पड़ा। बहुत बड़े इंकलाबी बनते हो मेरी बातों की खिलाफत करते हो। शायद तुमको पता नहीं है कि मैं -क्या कर सकता है। केसवानी साहब उन दिनों को याद करते-करते काफी भावुक हो गए। फिर बोले उस समय तो मेरी आवाज ही नहीं निकली, लेकिन मार्टिन का गरजना जारी था। वह बोला- मैं तुमको कालापानी भेज रहा हूं। उस समय यह शब्द कालापानी इंकलाबियों के लिए बहुत बड़ी सजा मानी जाती थी। उस समय हमको भी पता नहीं था कि यह कालापानी आखिर होता क्या है और वहां पर जाने वाला कभी वापस आता भी है या नहीं। अन्य कैदियों के साथ मुझको भी उनके साथ बैठा दिया गया। अब तक मैंने सब कुछ भगवान के ऊपर छोड़ दिया था। सोचा अब जो भी होगा वह देखा जाएगा। तीन-चार दिन के सफर के बाद हम लोग पोर्ट ब्लेयर पहुंचे तब जाकर यह पता चला कि इसी को कालापानी कहते हैं। वहां पर उस समय करीब 123 कैदी थे और कमरे खचाखच भरे हुए थे। मुझको एक छोटा सा कमरा दिया गया। सच कहूं  तो उस कमरे में मुझको बहुत डर लगता था, क्योंकि एक तो चारों तरफ गहरा सागर उसकी लहरें रात को इतनी तेज गरजती थी कि मैं सो भी नहीं पाता था। आप यह समझ लीजिए कि मैंने शुरू के तीन महीने तो वहां पर केवल रात को जागते हुए काटे। वहां पर मैं दिन में सोता था और रात को जागता था। वहां पर यह दिक्कत थी कि मेरी अन्य कैदियों की तरह से हाजिरी नहीं होती थी। एक दिन मैंने साहस कर वहां के जेलर जिनको ड्यूक साहब कहा जाता था। उनसे कहा कि साहब आप मेरी हाजिरी तो लीजिए। आखिर मेरी सजा कब तक है और वह कब पूरी होगी, इसका अन्दाजा मुझे भी तो होना चाहिए।
उस पर ड्यूक ने कहा हाजिरी कैसे लूं। तुम तो दूसरी जेल के कैदी हो, सजा के तौर पर यहां भेजा गया है क्योंकि तुमने जेल में भी बहुत उपद्रव मचा रखा था और अब मुझे लग रहा है कि धीरे-धीरे तुम वहीं उपद्रव यहां भी मचाना शुरू कर दोंगे। तुम्हारी दिक्कत यह है कि तुम सवाल बहुत पूछते हो और यहां पर तुम्हे किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिलेगा। इसके बाद केसवानी जी ने ड्यूक को गुस्से भरी नजरों से देखते हुए कहा कि आखिर आप लोग हमें कब तक डराते रहोंगे। अरे जब हम तुम्हारी गोलियों की गड़गड़ाहट, तोपों की तड़तड़ाहट  से नहीं डरे तो तुम्हारी बातों से क्या डरेंगे बस इतना ही कहते ही जो उसका चेहरा लाली से भरा था वह जोश से और भी लाल हो गया और मुझे अंग्रेजी में गालिया ं बकने लगा। पलटकर मैने भी अपशब्दों का उपयोग किया तो तब वह समझ गया कि इससे बात करना बेकार है और मुझे दो दिन तक खाना नहीं दिया और न ही कोई बैरक में आया। मैं भी शांति बनाकर बैठा रहा। जिससे उनके अंदर एक घबराहट  सी हो गई कि कहीं मैं मर तो नहीं गया। मैं तो अपना भगवान का नाम जपते-जपते सोता रहा और मन के अंदर यह तय कर लिया था कि यहां तो नहीं मरूंगा। क्योंकि बाहर जाकर अभी और लड़ाई लड़नी है। बस वहीं संकल्प मुझे ताकत देता रहा, जिसकी वजह से मैं दो दिनों तक भूखा-प्यासा आराम से रह सका। तब मेरे मन में कोई डर था और न ही घबराहट थी। बस एक ही विचार लगातार घूम रहा था कि देश को आजादी कैसे मिलेगी। यह जुनून दिल-दिमाग से लेकर पेट तक काम कर गया दों दिन बाद जब एक जेल का कर्मचारी मुझे देखने आया तो उसने मुझसे कहा कि हम तो समझे थे कि तुम तो मर गए हो। पर तुम हो जिंदा हो। मेरी एक बात मानो जेलर से माफी मांग लो, बाकी मैं बात कर लूंगा। तब मैंने कहा कि जब दो दिन तक नहीं मरा तो कुछ दिन और जिंदा रह सकता हूं। पर माफी नहीं मांगूगा। गुस्से में आकर कर्मचारी बोला मरो, मैरा क्या है। मैं तो तुम्हें बचाना चाह रहा हूं यह कहते हुए गुस्से से चला गया। कुछ घंटों बाद जेलर ड्यूक आया और मेरे को बड़े गौर से देखकर पूछा अभी तक हो। मेरे अंदर भी गुस्सा और जोश भरा था। मैंने कहा कि देश की आजादी तक तो रहना ही है। हल्की से गुस्से वाली मुस्कुराहट के साथ बोला ठीक है, लड़ते रहो। खाना खा लेना और आइंदा शांति के साथ रहना। क्योंकि तुम मेरे लिए एक जिम्मेदारी हो, मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी मौत मेरी जेल में हो।
कुछ दिनों में तुम्हे वापस भेजना है, इसलिए चुपचाप रहो और कुछ दिन यहां काटकर चले जाओ। मैं तुम्हारी जानकारी मंगवाता हूं। मुझे लगा कि यह ठीक समय है कि मैं भी अपनी बातें मनवा लूं। मैंने कहा मेरी हाजिरी लेना शुरू करो। कब तक की सजा है, इसकी जानकारी दो।  यह सुनते ही वह एकदम लाल-पीला हो और बोला वापस अपनी हरकतों पर ही आ गए। जानकारी जब आ जाएगी तब दे दूंगा अभी शांति बनाकर रखो। मुझे उस दिन एक बात समझ में आ गई थी कि अंग्रेजों पर पहले दबाव बनाना चाहिए, फिर बात करना चाहिए। उससे वे आसानी से बात कर लेते हैं वर्ना अपनी ताकत दिखाकर आपको और आपकी ताकत को कुचल देते हैं।  फिर काफी दिनों तक शांति से सब कुछ चल रहा था फिर अचानक मुझे वापस भेजने की तैयारी शुरू की गई। पर मैंने जाने से इनकार कर दिया। रिलीज आॅर्डर मांगने पर मना कर दिया था कि मैं बिना रिलीज आॅर्डर के नहीं जाऊंगा। तब मुझे कहा गया कि रिलीज आॅर्डर तुम्हें पुरानी जेल से मिलेगा। आॅर्डर वहीं भेज दिया गया है। बड़ी देर तक विवाद चलता रहा। मेरे विवाद की वजह से जेल में बहुत अफरा-तफरी मची हुई थी। बहुत से आंदोलनकारियों द्वारा मुझे समझाया गया कि वापस चले जाओ वही तुम्हारे लिए बेहतर है। यहां कोई आवास सुनने वाला नहीं है। तुमने जो ड्यूक के ऊपर दबाव बनाया है उसका फायदा हम लोगों को मिलेगा। अगर इस तरह से ही लड़ते रहे तो वह मारपीट पर उतर आएगा। फिर उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा। उनकी मजबूरी को देखते मैंने निर्णय लिया कि वापस जाने में ही मेरी और उनकी भलाई है।
कुछ दिनों में तुम्हे वापस भेजना है, इसलिए चुपचाप रहो और कुछ दिन यहां काटकर चले जाओ। मैं तुम्हारी जानकारी मंगवाता हूं। मुझे लगा कि यह ठीक समय है कि मैं भी अपनी बातें मनवा लूं। मैंने कहा मेरी हाजिरी लेना शुरू करो। कब तक की सजा है, इसकी जानकारी दो।  यह सुनते ही वह एकदम लाल-पीला हो और बोला वापस अपनी हरकतों पर ही आ गए। जानकारी जब आ जाएगी तब दे दूंगा अभी शांति बनाकर रखो। मुझे उस दिन एक बात समझ में आ गई थी कि अंग्रेजों पर पहले दबाव बनाना चाहिए, फिर बात करना चाहिए। उससे वे आसानी से बात कर लेते हैं वर्ना अपनी ताकत दिखाकर आपको और आपकी ताकत को कुचल देते हैं।  फिर काफी दिनों तक शांति से सब कुछ चल रहा था फिर अचानक मुझे वापस भेजने की तैयारी शुरू की गई। पर मैंने जाने से इनकार कर दिया। रिलीज आॅर्डर मांगने पर मना कर दिया था कि मैं बिना रिलीज आॅर्डर के नहीं जाऊंगा। तब मुझे कहा गया कि रिलीज आॅर्डर तुम्हें पुरानी जेल से मिलेगा। आॅर्डर वहीं भेज दिया गया है। बड़ी देर तक विवाद चलता रहा। मेरे विवाद की वजह से जेल में बहुत अफरा-तफरी मची हुई थी। बहुत से आंदोलनकारियों द्वारा मुझे समझाया गया कि वापस चले जाओ वही तुम्हारे लिए बेहतर है। यहां कोई आवास सुनने वाला नहीं है। तुमने जो ड्यूक के ऊपर दबाव बनाया है उसका फायदा हम लोगों को मिलेगा। अगर इस तरह से ही लड़ते रहे तो वह मारपीट पर उतर आएगा। फिर उसे रोकना मुश्किल हो जाएगा। उनकी मजबूरी को देखते मैंने निर्णय लिया कि वापस जाने में ही मेरी और उनकी भलाई है।

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER