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‘सोलमेट्स: द फाइनल चैप्टर – शंकरागढ़ डायरीज़ 3′ का गरिमामय विमोचन सम्पन्नभोपाल में साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं का अद्भुत संगम, प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने कहा— यह केवल उपन्यास नहीं, समकालीन हिन्दी साहित्य की उल्लेखनीय उपलब्धि है

भोपाल के प्रतिष्ठितदुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालयका सभागार रविवार की सुबह साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं के एक अविस्मरणीय उत्सव का साक्षी बना, जब प्रख्यात लेखक, शिक्षक एवं कविडॉ. शिलादित्य वर्माकी बहुप्रतीक्षित पाँचवीं पुस्तक‘सोलमेट्स: द फाइनल चैप्टर – शंकरागढ़ डायरीज़ 3′का भव्य विमोचन सम्पन्न हुआ।
इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल द्वारा प्रकाशित यह कृति चर्चित ‘शंकरागढ़ डायरीज़’ त्रयी की अंतिम पुस्तक है। लगभग एक दशक में विकसित इस साहित्यिक यात्रा का समापन देखने के लिए साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, कलाकारों तथा पुस्तक-प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। कार्यक्रम के प्रारम्भ से ही सभागार पूरी तरह भरा हुआ था और पूरे आयोजन के दौरान साहित्यिक आत्मीयता तथा गंभीर विमर्श का वातावरण बना रहा।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों के स्वागत एवं हरित सम्मान से हुआ। इसके पश्चात् वरिष्ठ साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में पुस्तक का औपचारिक विमोचन किया गया। मंच परश्री उमाकांत गुंदेचा, सुश्री नुसरत मेहदी, डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, श्री विजय मनोहर तिवारी, श्री सुरेश पटवा, इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस के प्रबंध निदेशक श्री मनीष गुप्ता तथा लेखक डॉ. शिलादित्य वर्माउपस्थित थे। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन सुश्री विशाखा राजुरकर ने किया।
स्वागत उद्बोधन मेंश्रीमती रीता वर्माने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं पाठकों का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी लेखक की सबसे बड़ी शक्ति उसके पाठक होते हैं। उन्होंने कहा कि डॉ. शिलादित्य वर्मा की लेखन-यात्रा निरन्तर विकसित होती रही है और यह पुस्तक उसी समर्पण, अध्ययन और संवेदनशील दृष्टि का परिणाम है।
अपने मुख्य वक्तव्य मेंडॉ. शिलादित्य वर्माने कहा कि‘सोलमेट्स: द फाइनल चैप्टर‘केवल उनकी कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि वर्षों से पाठकों के साथ चले संवाद की परिणति है। उन्होंने स्मरण किया कि दूसरी पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद उन्हें सबसे अधिक पूछा गया प्रश्न था— “अपर्णा का क्या हुआ?” यही प्रश्न इस उपन्यास के सृजन की सबसे बड़ी प्रेरणा बना। उन्होंने कहा कि इस त्रयी की यात्रा 2018 में एक छोटी-सी कहानी से आरम्भ हुई थी, जिसने धीरे-धीरे एक ऐसे साहित्यिक संसार का रूप ले लिया जिसमें पात्रों के साथ-साथ ‘शंकरागढ़’ स्वयं एक जीवंत चरित्र बन गया।उन्होंने कहा कि यदि यह पुस्तक पाठकों को अपने जीवन, अपने संबंधों और अपनी स्मृतियों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करती है, तो वे अपने लेखन को सफल मानेंगे।
प्रख्यात लेखक श्री सुरेश पटवाने लेखक को बधाई देते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवीय संवेदनाएँ हैं और यह उपन्यास उसी परंपरा को आगे बढ़ाता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब समाज तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, तब ऐसी रचनाएँ पाठकों को अपने सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक देश-विदेश के हिन्दी पाठकों के बीच व्यापक रूप से सराही जाएगी।
वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतकश्री विजय मनोहर तिवारीने कहा कि यह उपन्यास केवल प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि समय, स्मृति, प्रवासी जीवन, परिवार और सामाजिक उत्तरदायित्व की कथा है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात की सराहना की कि लेखक ने किसी काल्पनिक नगर को इस प्रकार रचा है कि वह पाठक के मन में वास्तविक नगर की तरह बस जाता है। उन्होंने कहा कि आज हिन्दी साहित्य को ऐसे ही विश्वसनीय कथा-संसारों की आवश्यकता है, जो पाठकों को केवल कहानी न सुनाएँ बल्कि उन्हें अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करें।
प्रख्यात पत्रकार एवं साहित्यकारसुश्री नुसरत मेहदीने कहा कि इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी भावनात्मक प्रामाणिकता है। उन्होंने कहा कि लेखक ने प्रेम को केवल रोमानी अनुभव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे परिवार, जिम्मेदारी, धैर्य, प्रतीक्षा और त्याग जैसे जीवन-मूल्यों से जोड़ा है। उन्होंने विशेष रूप से उपन्यास में महिला पात्रों की संवेदनशील प्रस्तुति तथा कोविड काल के मानवीय चित्रण की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक समकालीन समाज का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भी है।
अपने विशिष्ट और रोचक अंदाज़ में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकारडॉ. ज्ञान चतुर्वेदीने कहा कि साहित्य तभी टिकता है जब उसके पात्र पुस्तक बंद होने के बाद भी पाठक के साथ बने रहें। उन्होंने कहा कि डॉ. शिलादित्य वर्मा ने अपने पात्रों को आदर्श नहीं बनाया, बल्कि मनुष्य बनाया है—जो प्रेम करते हैं, टूटते हैं, संघर्ष करते हैं, गलतियाँ करते हैं और उन्हीं अनुभवों से परिपक्व होते हैं। उन्होंने लेखक के शोध, भाषा की सहजता तथा कथा की विश्वसनीयता की विशेष सराहना करते हुए कहा कि यह उपन्यास समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य में उल्लेखनीय स्थान प्राप्त करेगा।
प्रमुख डागरवानी ध्रुपद गायक श्री उमाकांत गुंदेचाने कहा कि किसी भी बड़े साहित्य की पहचान उसके पात्रों के साथ-साथ उसके परिवेश से होती है। उन्होंने कहा कि ‘शंकरागढ़’ इस त्रयी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है, क्योंकि वह केवल कहानी की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि स्वयं एक जीवंत पात्र के रूप में उभरता है। उन्होंने डायरी शैली की विशेष चर्चा करते हुए कहा कि इस शिल्प ने पात्रों के मनोविज्ञान और आत्मसंवाद को अत्यंत विश्वसनीय बनाया है तथा पाठक को कहानी का दर्शक नहीं, सहभागी बना दिया है।
सुप्रसिद्ध रंगकर्मी, रंग-निर्देशक तथा फ़िल्म एवं टेलीविज़न अभिनेताश्री राजीव वर्माने अत्यंत भावुक शब्दों में कहा कि किसी भी कलाकार की सबसे बड़ी पूँजी उसकी ईमानदारी और निरन्तर साधना होती है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय रंगमंच, सिनेमा और अभिनय को दिया है, जबकि उनके पुत्र ने शब्दों को अपना माध्यम चुना। दोनों माध्यम अलग अवश्य हैं, किन्तु उनका उद्देश्य एक ही है—मनुष्य के भीतर छिपी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देना।
उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का विशेष संतोष है कि डॉ. शिलादित्य वर्मा ने लोकप्रियता की आसान राह चुनने के बजाय धैर्य, अध्ययन और साहित्यिक अनुशासन का मार्ग चुना। उन्होंने कहा कि ‘शंकरागढ़ डायरीज़’ केवल तीन पुस्तकों की श्रृंखला नहीं, बल्कि समय, स्मृति और मानवीय संबंधों का ऐसा संसार है जिसमें पाठक स्वयं को खोज सकता है। उन्होंने युवा लेखकों से आग्रह किया कि वे मौलिक लेखन करें, अधिक पढ़ें और साहित्य को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के रूप में देखें। उन्होंने कहा कि किसी भी लेखक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उसके पाठकों का विश्वास होता है और उन्हें विश्वास है कि यह त्रयी आने वाले वर्षों में भी पाठकों के बीच जीवित रहेगी।
कार्यक्रम के दौरान अनेक वक्ताओं ने इस बात पर भी बल दिया कि उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता उसकीडायरी शैली, विश्वसनीय चरित्र-चित्रण, कोविड काल का संवेदनशील चित्रण, प्रवासी भारतीय जीवन की यथार्थपरक प्रस्तुतितथाकाल्पनिक नगर ‘शंकरागढ़’ का जीवंत निर्माणहै। वक्ताओं ने इसे समकालीन हिन्दी साहित्य की एक उल्लेखनीय उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह केवल प्रेमकथा नहीं, बल्कि समय, स्मृति, परिवार, मित्रता और मानवीय संबंधों का व्यापक आख्यान है।
अपने समापन उद्बोधन में डॉ. शिलादित्य वर्मा ने सभी अतिथियों, पाठकों, मित्रों, परिवार तथा इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह त्रयी भले ही अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई हो, किन्तुशंकरागढ़की स्मृतियाँ और उसके पात्र पाठकों के मन में आगे भी जीवित रहेंगे। उन्होंने कहा कि साहित्य का वास्तविक जीवन पुस्तक के अंतिम पृष्ठ के बाद प्रारम्भ होता है और उन्हें विश्वास है कि यह कृति भी पाठकों के जीवन का हिस्सा बनेगी।
अंत में इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस के प्रबंध निदेशकश्री मनीष गुप्ताने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, पत्रकारों, पाठकों एवं आयोजन में सहयोग देने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया तथा विश्वास व्यक्त किया कि ‘सोलमेट्स: द फाइनल चैप्टर – शंकरागढ़ डायरीज़ 3’ हिन्दी साहित्य के गंभीर पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करेगी।
कार्यक्रम के उपरांत अतिथियों एवं पाठकों ने लेखक से संवाद किया, पुस्तकों पर हस्ताक्षर प्राप्त किए तथा बड़ी संख्या में पुस्तक की प्रतियाँ खरीदीं। पूरे आयोजन ने यह सिद्ध किया कि गुणवत्तापूर्ण हिन्दी साहित्य के प्रति पाठकों का उत्साह आज भी उतना ही प्रबल है और ऐसी साहित्यिक यात्राएँ समाज के सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध बनाती हैं।







