बात दिल की
शशी कुमार केसवानी

नमस्कार दोस्तो, आइए आज बात करते है एक ऐसी शख्सियत की जिसने अभिनय की आखिरी पायदान से भी ऊपर का अभिनय करके दिखाया। शरारती मुस्कान से और अपनी अलग डायलाग डिलेवरी से लोगों के दिमाग में ही नहीं दिलों में स्थायी जगह बना ली। जी हां मैं बात कर रहा हूं आज मेरे पसंदीदा कलाकारों में से एक साथ ही साथ मेरे पिता और भाई के दिलों में बसने वाले संजीव कुमार की। जी हां दोस्तों संजीव कुमार ने हर रोल को इतनी सहजता से लिया कि जिसके लिए मेरे पास तो शब्द ही नहीं है। बचपन से जवानी उनकी नकल करते-करते गुजरी। जब पहली बार उनसे मिला था तब समझ में नहीं आ रहा था कि उनसे क्या पूछू और क्या न पूछू। पर उनका सरल स्वभाव से मेरी जबान पर कुछ सवाल आ गए। उन्होंने भी बहुत ही मजाकियां अंदाज में जवाब दिए। मेरी कई मुलाकातें उनसे मुंबई में होती थी। हालांकि लोग उनके लिए बात कंजूसी की करते थे। पर मैंने कई बार उनकी दिलदारी भी देखी थी। बोनी कपूर ने मुझे बताया था। एक फिल्म के समय उनके पास पैसे कम पड़ गए थे। संजीव कुमार में अपने कमरे में बुलाकर कहा ये तकिया उठाओ २० लाख रुपये रखे है वो ले लो। इन पैसो के पीछे कोई शर्त नहीं रखी। खिलाने पिलाने में भी उनकी दिलदारी देख चुका हुं। पर उनका रहन सहन सादगी के कारण लोग उन्हें कंजूस समझ बैठते थे । जबकि दिल से बहुत बड़े थे। तो आइए उनके जीवन के कुछ अनसुने किस्सों पर बात दिल की करते है।
संजीव कुमार का जलवा किसी सुपरस्टार से ऊपर ही था। जिसमें दर्शकों को लगातार चौंकाते रहने वाला हुनर हो, जिसकी बॉक्स ऑफिस में धमाल मचाने वाली फि़ल्में हों या फिर एक से बढक़र एक खूबसूरत हसीनाओं का साथ रहा हो, स्टारडम और पीने-पिलाने के साथ दोस्ती निभाने का शगल के चलते हमेशा वे लोगों से घिरे रहते थे, लेकिन जीवन के आखिरी समय में संजीव कुमार बेहद तन्हाई में रहे और अपनी बीमारी से अकेले जूझते रहे. किसी का भी साथ लेना पसंद नहीं करते थे। यह भी कहा जा सकता है कि जीवन के सफऱ में भी बतौर कलाकार संजीव कुमार हमेशा इम्तिहान देते अकेले ही नजऱ आए. बेहद कम उम्र में पिता की मौत, उसके बाद परिवार चलाने के लिए मां का संघर्ष, थिएटर से लगाव, परिवार की जि़म्मेदारी और फि़ल्मों में काम पाने का संघर्ष, यानी संजीव कुमार हमेशा संघर्ष करते रहे. इन सबके बावजूद उनके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान हमेशा बनी रही और उनके अभिनय की ख़ास शैली में इस मोहक मुस्कान का अहम योगदान रहा.


उन्होंने बी ग्रेड की फि़ल्मों से शुरुआत करते हुए महज़ अभिनय के बलबूते वह स्टारडम हासिल कर लिया था, जिसके चलते मल्टीस्टारर फि़ल्मों में भी वो सबसे अधिक मेहनताना वसूलने लगे थे. संजीव कुमार को यह कामयाबी किसी खैरात में नहीं मिली थी. उन्होंने इसे अपनी मेहनत से हासिल किया था. इसमें उनके साथ बचपन से ही अभिनय की अलग क्षमताएं थी। पर अभिनय की तालीम को हासिल करने के लिए संजीव कुमार की मां ने अपने जेवर गिरवी रखे थे तब जाकर शशधर मुखर्जी के एक्टिंग स्कूल की फीस जमा हो पायी थी. उनकी मां चाहती थी कि बेटा पढ़ लिख कर डॉक्टर या वकील बने या सरकारी बड़ा अफसर बने। लेकिन संजीव कुमार की रूचि अभिनय में देखकर उनकी मां ने अभिनय की तालीम देने का फ़ैसला लिया था. संजीव कुमार की संघर्ष की दिलचस्प कहानी में उनके नाम की कहानी भी शामिल है. दरअसल हिंदी फि़ल्मों में काम तलाशने से पहले वे हरिहर जेठालाल के नाम से थिएटर की दुनिया में काम करने लगे थे. इप्टा के नाटकों में काम करने के दौरान एके हंगल ने चर्चित नाटक डमरू में संजीव कुमार को साठ साल के बूढ़े का रोल दे दिया था. महज 19 साल की उम्र में संजीव कुमार ने यह किऱदार निभाकर कर लोगों को भौंचक्का कर दिया था. हिंदी फि़ल्मों में काम करने की तलाश में हरिहर जेठालाल जरीवाला को पहला मौका 1960 की फि़ल्म हम हिंदुस्तानी में मिला था. सुनील दत्त और आशा पारेख की इस फि़ल्म में संजीव कुमार का रोल महज़ दो सेकेंड के क्लोज़अप वाला था. इसके बाद उन्होंने निर्माता निर्देशकों और स्टूडियोज़ के चक्कर लगाने शुरू किए. इसी दौरान थिएटर के अपने दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए हरिहर जेठालाल ने कहा कि उन्हें अपना स्क्रीन नेम तलाशना होगा. संजीव कुमार की मां का नाम शांताबेन जरीवाला था.
उन्होंने अपने दोस्तों से कहा कि नाम तो एस से रखूंगा और उस वक्त दिलीप कुमार और अशोक कुमार की कामयाबी का असर देखते हुए उन्होंने टाइटिल तय कर लिया था जिसमें कुमार आएगा। यही वजह थी कि नाम तय कर लिया- संजय कुमार. संजीव कुमार के करियर की दूसरी हिंदी फि़ल्म आओ प्यार करें 1964 में रिलीज़ हुई और इसमें उनका क्रेडिट संजय कुमार गया. इस फि़ल्म के बाद कमाल अमरोही ने उन्हें शंकर हुसैन फि़ल्म (जो कमाल नहीं बना सके) के लिए अनुबंधित किया और कहा कि ये नाम बहुत इंप्रेसिव नहीं है.
कमाल अमरोही ने संजीव का स्क्रीन नेम गौतम राजवंश रखा. हालांकि पाकीज़ा फि़ल्म के काम में कमाल इतना डूब चुके थे कि उन्होंने ये फि़ल्म कुछ शॉट्स के बाद पूरी नहीं की. इस लिहाज से देखें तो गौतम राजवंश नाम भी संजीव कुमार को जंचा नहीं. इसी बीच 1964 में दोस्ती फि़ल्म सुपर हिट हो गई और संजय ख़ान इस फि़ल्म से स्थापित हो गए. ऐसे में एक संजय ख़ान के होते हुए संजय कुमार नाम से फि़ल्म करना फ़ायदेमंद नहीं होगा, यह सोच कर हरिहर जेठालाल ने फिर अपने दोस्तों के साथ बहुत सोच-विचार कर नाम तय किया संजीव कुमार. संजीव कुमार के नाम से वे पहली बार 1965 में आयी निशान फि़ल्म में नजऱ आए जो एक तरह की स्टंट फि़ल्म थी. शुरुआती दिनों में ऐसी फि़ल्में करने से उनको फ़ायदा कम और नुकसान ज़्यादा हुआ.
संजीव कुमार की मौत के 36 सालों तक संजीव कुमार के जीवन सफऱ को बताने वाली कोई किताब मौजूद नहीं थी. इस कमी को काफ़ी हद तक हनीफ़ ज़ावेरी और सुमंत बत्रा की किताब ने पूरा किया है.
1968 में संघर्ष फि़ल्म में संजीव कुमार ने दिलीप कुमार के सामने दमदार अभिनय करके अपना जो सिक्का जमाया, वह उनकी मौत के समय तक यानी अगले 17 सालों तक जारी रहा. इस दौरान संजीव कुमार ने ना केवल बॉक्स ऑफि़स पर कामयाब फि़ल्में दीं बल्कि लीक से हटकर ऐसी फि़ल्मों में भी काम किया जो अपने दौर से कहीं आगे की फि़ल्में थीं. 1970 में प्रदर्शित खिलौना में मानसिक बीमारी का सामना कर रहे किरदार ने उन्हें शोहरत और कामयाबी के आसमान पर बिठा दिया मानसिक बीमार होने के बावजूद भी चेहरे की मासूमियत ने जो जादू किया जो कोई और अभिनेता नहीं कर सकता। फिर दो साल बाद 1972 में आयी कोशिश में उन्होंने बिना बोले अपनी आंखों से जादू भरा अभिनय कर दिखाया जिसेे इंडस्ट्री लोग देख हैरान भी थी। लेकिन बतौर अभिनेता संजीव कुमार ने खुद को कभी रिपीट नहीं किया और ना ही किसी इमेज से वे टाइप्ड हुए. उन्हें ऑल सीजन एक्टर कहा जाने लगा था. अपनी इमेज की परवाह उन्हें रत्ती भर नहीं थी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह एक ही समय में अनामिका में जया भादुड़ी के प्रेमी की भूमिका निभा रहे थे और उसी वक्त परिचय में वे उनके पिता की भूमिका निभा रहे थे. शोले में उन्होंने जया भादुड़ी के ससुर की भूमिका अदा की.
एक तरफ़ वे शोले और त्रिशूल जैसी मल्टीस्टारर फि़ल्मों में अपने अभिनय से लोगों का दिल जीतते रहे वहीं दूसरी तरफ़ प्रयोगधर्मी फि़ल्मों के ज़रिए भी लोगों को चौंकाते रहे. 1974 में नया दिन, नई रात में उन्होंने नौ तरह कि किरदार निभाकर लोगों को अचरज में डाल दिया था.
1977 में काफी कम पैसों में सत्यजीत राय के साथ शतरंज के खिलाड़ी में काम करना स्वीकार कर लिया. 1978 में पति, पत्नी और वो के रूप में सुपरहिट फि़ल्म दी तो 1982 में अंगूर जैसी बेमिसाल कॉमिक फि़ल्म दी.
1960 से 1985 के बीच संजीव कुमार ने 153 फिल्मों में काम किया. इसमें दस्तक और कोशिश के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. बी-ग्रेड की फि़ल्मों में काम करके यहां तक पहुंचना आसां नहीं होता लेकिन संजीव कुमार ने इस मुकाम को हासिल कर दिखाया. इस सफऱ में संजीव कुमार का शादीशुदा नूतन और हेमा मालिनी के साथ अफेयर जैसा संबंध भी रहा, लेकिन दोनों ही मामले में बात अटक गयी. इसके बाद सुलक्षणा पंडित सहित कुछ अन्य अभिनेत्रियों के साथ भी उनके संबंधों की चर्चा हुई. लेकिन संजीव कुमार ने शादी नहीं की. प्रेम संबंधों में नाकामी या अकेलेपन को दूर करने के लिए संजीव कुमार ने खुद को शराब में डूबो लिया था. संजीव कुमार बचपन से हृदय संबंधी रोग से ग्रस्त थे और शराब के नशे ने उनकी बीमारी को कहीं बढ़ाया ही. करियर के चमकते दौर में महज़ 37 साल की उम्र में उन्हें पहली बार हार्ट अटैक आया था. लेकिन उन्होंने अपनी जीवनशैली में कोई खास बदलाव नहीं किया. इसका खामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ा और जल्दी ही उन्हें दूसरा अटैक भी आया. इसके बाद संजीव कुमार ने अमेरिका जाकर अपनी ओपन हार्ट सर्जरी भी करायी. वे जब अमेरिका से लौटे तो उनके पूरी तरह ठीक हो जाने की उम्मीद थी, लेकिन सिनेमाई निर्माताओं के काम पर लौटने के आग्रह और फंसे हुए प्रोजेक्ट को पूरा करने की उनकी खुद की जि़द ने उन्हें आराम का मौका नहीं दिया. छह नवंबर, 1985 को संजीव कुमार के निधन पर उनके दोस्त और साथी कलाकार दिनेश हिंगू ने हनीफ़ ज़ावेरी से कहा था, अगर उसने शादी की होती तो वह ज़्यादा दिन तक जीवित रहता. वह आराम करना नहीं जानता था. बायपास सर्जरी के बाद भी उसने लगातार काम जारी रखा. फिल्म निर्माता उसकी मौत के जि़म्मेदार हैं. हालांकि हर साल छह नवंबर को संजीव कुमार अपनी मां की यादों में डूब जाते थे. छह नवंबर, 1980 को उनकी मां का निधन हो गया था और इसके बाद वे महज़ पांच साल ही रह पाए, बीमारी का सामना करते और लगातार फि़ल्मों में काम करते. संजीव कुमार के इस दौर को लेकर तमाम तरह की बातों की ख़ूब चर्चा होती रही, जिसमें उनके शराब की लत के साथ साथ कंजूस होना और महिला मित्रों पर भरोसा नहीं करने जैसी बात भी शामिल थी. कंजूसी की चर्चा होने की एक वजह तो यह भी रही होगी कि संजीव कुमार बेहद सामान्य कपड़े पहना करते थे और आम फिल्म सितारों की तरह पहनावे पर बहुत खर्च नहीं करते थे. हालांकि उनके नज़दीकी दोस्तों ने उन्हें इस बात का एहसास करा दिया था कि कोई भी उनसे मिलता-जुलता है तो उसकी एक वजह उनका पैसा है. इस पर संजीव कुमार ने थोड़ा बहुत यक़ीन कर लिया था और जीवन के आखिरी सालों में वे जल्दी दूसरों के साथ नहीं खुलते थे.
संजीव कुमार भले अपना परिवार नहीं बसा पाए हों, लेकिन परिवार की अहमियत का उन्हें बिलकुल अंदाज़ा था लिहाज़ा न केवल वे अपने परिवार के लोगों की मदद करते रहे बल्कि दूसरों के उजड़ते घरों को भी बचाया. शत्रुघ्न सिन्हा का जब अपनी पत्नी पूनम सिन्हा से तनाव काफी बढ़ गया था तब उसे सुलझाने में संजीव कुमार का अहम योगदान था, जिसका जिक़्र शत्रुघ्न सिन्हा भी करते रहे हैं. यही वजह है कि शत्रुघ्न सिन्हा उनके आजीवन सबसे बेहतर दोस्त बने रहे. संजीव कुमार की बहन के अमेरिका से आने के बाद ही उनका अंतिम संस्कार हुआ था. उनकी मौत की ख़बर के बाद अगले दिन मुंबई में फि़ल्म इंडस्ट्री में किसी तरह का कोई काम नहीं हुआ. सारी की सारी शूटिंग कैंसल कर दी गई थी. गुलज़ार भी उन्हें अपना ख़ास दोस्त मानते थे। हाल ही में पेंगुइन प्रकाशन से गुलज़ार के संस्मरणों पर आधारित एक पुस्तक आयी है, एक्चुअली आई मेट देम, ए मेमॉयर के नाम से. इसमें एक चैप्टर संजीव कुमार पर भी है. गुलज़ार ने भी अपने दोस्त को एक स्टार के बदले अपने दोस्त के तौर पर याद किया है.
गुलज़ार और संजीव कुमार की आपस में बहुत पटती थी. परिचय फि़ल्म से शुरू हुए साथ के बाद इन दोनों की जोड़ी ने मौसम, आंधी और नमकीन जैसी बेहतरीन फि़ल्में दीं. गुलज़ार ने भी लिखा है कि संजीव कुमार की मौत के बाद शत्रुघ्न सिन्हा 48 घंटे तक वहीं भाव शून्य बैठे रहे थे. गुलज़ार ने ये भी कहा है कि संजीव कुमार की मौत की वजह से भी उनका मन फि़ल्म बनाने से उचट गया था. हनीफ़ ज़ावेरी और सुमंत बत्रा की किताब में यह भी बताया है कि जब अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के बीच भी आपसी संबंधों में तनाव बढ़ा था तो संजीव कुमार ने सुलह कराने में अहम भूमिका निभाई थी और जया बच्चन उन्हें अपना भाई मानती थीं. संजीव कुमार की कंजूसी से उलट से कई नामचीन प्रोडयूसरों और एक्टरों ने बिना हिसाब-किताब के संजीव कुमार से पैसे लेने की बात स्वीकार की है. संजीव कुमार के निधन के बाद बोनी कपूर उनके परिवार वालों को पैसा लौटाने गए थे, जबकि परिवार वालों को पता भी नहीं था कि बोनी ने संजीव कुमार से पैसे लिए हुए थे. संजीव कुमार के सचिव जमनादास ने तब डायरी खोलकर परिवार वालों को बताया कि संजीव कुमार से उनके दोस्त अभिनेता और निर्माता निर्देशकों ने उधार के 94,36,000 रुपये लिए हुए थे. यह रकम आज भी कम नहीं है लेकिन 1985 में यह रकम कितनी बड़ी रही होगी इसका अंदाज़ा आप लगा सकते हैं. तब बैंकों में पांच साल में पैसा दोगुना हो जाता था, हालांकि मौजूदा समय में आठ साल से भी ज़्यादा का वक़्त लगता है और इस हिसाब से भी आप जोड़ें तो आज की तारीख में यह पैसा 100 करोड़ के बीच होता. संजीव कुमार के परिवार वालों ने इन लोगों से पैसे वापस हासिल करने की कोशिश की तो किसी ने पैसे नहीं लौटाए. परिवार वाले सुनील दत्त के पास गए कि उनकी कोशिशों से पैसा वापस मिल जाए. सुनील दत्त की इंडस्ट्री में काफ़ी साख थी लेकिन उन्हें इंडस्ट्री के तौर तरीखे बेहतर ढंग से मालूम थे, तो उन्होंने परिवार वालों से यही कहा कि मैं पूरी कोशिश तो करूंगा लेकिन पैसा वापस आने की उम्मीद कम ही है. संजीव कुमार के परिवार वालों के पास वह सूची आज भी मौजूद है. संजीव कुमार के जीवन से जुड़ी तमाम छोटी बड़ी बातेें हमें इस तरह से मालूम है कि संजीव कुमार के लिए हमारी दिवानगी भी कम नहीं थी। संजीव कुमार अपने पहनावे को लेकर बहुत सहज रहा करते थे किसी की चिंता भी नहीं करते थे कि कौन क्या सोच रहा है और नानवेज खाना खाने के लिए वे किसी भी साथी कलाकार के घर रात में जा धमकते थे. जहां देर रात तक आराम से खाना खाते बातें करते कई बार तो दोस्तों के घर ही सो जाते। यहां यह बात जरूर बता दूं गुलजार ने संजीव कुमार पर अपने संस्मरण की पहली पंक्ति में भी उन्हें नॉन वेज खाने का मुरीद बताया है जो हर वक्त बाहर खाने के लिए तैयार रहते थे। खासतौर पर मटन जो घरों में बनता है वो बहुत ज्यादा पसंद करते थे। चिकन के बने हुए कुछ व्यंजन पसंद थे पर ग्रेवी के साथ चिकन उन्हें कम पसंद आता था। ऐसा उन्हीं के साथ मैंने मुंबई के ताज महल होटल में देखा था। संजीव कुमार में वैसे तो किसी फि़ल्म स्टार वाले नखरे नहीं थे. लेकिन वे अमूमन शूटिंग के लिए सेट पर लेट पहुंचते थे. इसकी एकलौती वजह यह थी कि वे सुबह तक शराब पीते रहते थे. जिस कारण वे दिन में देर से उठते थे। बावजूद उनकी लेट लतीफ़ी के, डायरेक्टर और साथी कलाकार बहुत नाराज़ नहीं होते थे, क्योंकि संजीव कुमार अपने शॉट्स केवल एक टेक में करने के लिए जाने जाते थे और पूरी फि़ल्म इंडस्ट्री को पता था कि दूसरे कलाकार जिस काम को आठ घंटे में करते हैं, संजीव कुमार महज़ चार घंटे में कर लेंगे. इसके अलावा उनका ह्यूमर सेंस इतना ज़बर्दस्त था कि साथी कलाकार उनकी बातों पर हंसे बिना नहीं रह पाते थे. लिहाजा सेट पर उनके पहुंचने से पहले जो तनाव पसरा होता था, संजीव कुमार के पहुंचते ही छू मंतर हो जाता था। फिल्म पति-पत्नि और वो का गाना ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए। बहुत ही फेमस हुआ था। लोग आज भी उस गाने को याद करते है और संजीव कुमार के पट्टे वाले कच्छे को भी याद करके उनके बारे में कई बार चर्चा करते है।
संजीव कुमार को सैल्यूट

Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER