लालित्य ललित

रात पांडेजी की सोते सोते आंख खुल गई कि एक लेखक को लाखों रुपए की रॉयल्टी मिल गई और वह भी उस उम्र में जब आप अखरोट भी तोड़ नहीं सकते।केवल किशमिश खा सकते है।
यह तो वहीं बात हुई कि जब दिल्ली में बैठे हुए साहित्यकार को भी सर्वोच्च श्री का सम्मान दिया गया हो,किसी ने दबे स्वर में कहा कि छात्र हों तो ऐसा उसने अपना फर्ज निभाया।
साहित्य में इस तरह की घटनाएं बहुत है कोई किसी को ऑब्लाइज करता है तो कोई प्रयास करता है कि कोई उससे ऑब्लाइज हो जाएं।
बहरहाल अभी तो यह भी खबर आई कि उत्तरप्रदेश का एक लेखक स्व घोषित योजना के तहत प्रचारित कि अब उसने तीन सौ से ऊपर किताबें लिखने का रिकॉर्ड बनाया है,किसी ने यह भी कहा कि क्या जमाना आ गया है!
जबकोई नहीं छापता तो खुद प्रकाशक बन जाओ और अपनी किताबें छापना शुरू कर दो,बेशक कोई पढ़े या न पढ़े! क्या फर्क पढ़ता है!
वैसे भी बाजार में कितने अखबार और कितनी पत्रिकाएं निकलती है और कितनी एक वंदे द्वारा पढ़ी जाती है! नहीं न तो फिर!
दिमाग पर ज्यादा लोचा मत डालिए,वैसे भी देश भर में अवैध निर्माण जोरों पर है,जब टूटेगा,तब टूटेगा,पहले से काहे चिंता!
ऐसे कई तरह के सवाल मन में घूमते है,उनका क्या! मन है कोई देविका गजोधर का दिल नहीं कि कोई भी चाहेगा और दरवाजा नॉक कर देगा!
वैसे मै जानता हूं कि इस सभा में भी कई सारे लोग मैरिड है लेकिन आप को शो ऐसा करेंगे कि वे जन्मजात अविवाहित है,पहाड़ है आदमी रोमांटिक हो ही जाता है;वैसे भी कैंची धाम से गुजरने पर मन में एक बार ऐसा विचार आता भी है लेकिन भगवान जी याद दिला देते है कि वत्स मत भूलो कि तुम शादी शुदा हो और इधर उधर देखना मना ही नहीं वर्जित भी है।
बहरहाल अपने विलायती राम पांडेय भी उन में से एक ही है,एक ही है माने टिपिकल फैमिली मैन,लेकिन जहां गए तो वहीं के हो कर रह गए,यह उनकी अदा ही नहीं निष्ठा भी है और उनका समर्पण भी है,काम के प्रति ।
समझें कुछ।
अब पांडेय जी ने सोचा कि कितने प्रतिशत लोगों ने अपनी सर्विस से स्वैच्छिक सेवानिवृति ली हो! एकाध को छोड़ कर,किसी का मन ही नहीं करता।
पांडेय जी के वो दोस्त है
सेवा राम साहनी।
उनका शगल है कि जब कुछ नहीं हो तो सेवा करने का बहाना खोज लो,घर के बाहर लंगर लगाओ और सड़क जाम कर दो,जो आएगा,उन्हें नमस्कार करेगा और आलू पूड़ी के साथ हलवा लेकर चलता बनेगा।
बात भी ठीक है,पैसे का सदुपयोग भी हो जाएगा और सड़क जाम करने का उनका मंसूबा भी खायब होजाएगा।
साहनी साहब को पांडे जी ने कहा कि लगता है आपकी चाल में कुछ खराबी है,मसलन ग्रीस तो कम नहीं जो गई!
हिन्दुस्तान में अगर यह बात किसी को तीन बार गंभीरता पूर्वक कहो तो उसके मन में भी आएगा कि बंदे की बात में दम है,यार चाल तो बिगड़ी जरूर है,हो सकता है उम्र का तकाज़ा हो,पांडे जी ने कहा भी कि साहनी साहब जब आप लाल टीशर्ट पहन लेते हो,गजब के लगते हो,और अच्छे अच्छे युवाओं को पानी पिला दो,ऐसे सितम ढाते हो,साहनी साहब मान भी जाते,अक्सर प्रेमी किस्म के लोग जल्दी झांसे में आ जाते है।
इश्क़ जिसको हो जाएं,वह उसे कम ही लगता है,ऐसे ही एक महत्वाकांक्षी लेखक की हुआ,उम्र उच्चतर शिक्षा की नजरों से देखी जाएं सत्तर पार थीं,कमरे में कई सम्मान चिन्ह थे,पर उन्हें अभी ही लगता था कि मोक्ष मिलने से पहल ये भी मिल जाएं और वह भी।
ऐसे ही अज़ान व्यक्ति किसी की सलाह पर पांडेय की कुटिया पधारे।पांडेय जी ने कहा कि कौन सी बड़ी बात है!
पूजा पाठ में मन लगाओ और एक महायज्ञ करना पड़ेगा जिसपर खर्चा करना पड़ेगा,उससे पहले तो बड़ा पुरस्कार वंचित है,सामने वाला झांसा राम की बातों में आ गया और फिर महायोगी की तरह उसे उपाय भी दिए गए।
लेकिन महत्वाकांक्षा लिए वह व्यक्ति चाहता था कि वह अपेक्षित राशि दें और तत्काल उसकी सम्मान वाली टिकट सुरक्षित हो जाएं।
ऐसा कभी हुआ है जो अब होगा।
पूजा पाठ भी हुई और उचित अनुचित तरीके पर गौर किया गया और अंतरिम बैठक में यह निर्णय हुआ कि अभी भी कुछ कमी है लिखना अलग बात है और सम्मान मिलना अलग।
दोनों की कार्यशैली अलग है,व्यवधान भी है,कोई पटाकर खुश है तो कोई पटाखे बेच कर।
दुनिया में यह नियम बांध लीजिए कि कोई भी आपके काम नहीं आएगा,यदि आप हुनर रखते है तो सत्ता पक्ष भी आपके गुण गाएगा और विपक्ष भी आपका अदर करेगा,यह बात सर्वविदित सत्य है।
तभी रामप्यारी ने पांडेय जी को फोन किया कि चीकूंकहां गया!
पांडेय जी ने कहा नए जमाने का है चीकू! ड्रैगन फ्रूट पसंद नहीं,किसी मियोनी से मिलने गया होगा,आई मीन मोमोज खाने!
और यहां बैठे कितने लोगों के चेहरे पर नए जमाने वाली हवा तैर गई!
तैरते तो हिंदीके लोग भी है अंग्रेजी फितरत में।
अब देखिए न महंगे फोन के लिए लोग क्या क्या सितम नहीं करते! और उन्हें कह दिया जाए कि पड़ोस में सेठी साहब के सत्यनारायण की कथा चल रही है जरा वहां बैठ आओ,बिल्कुल नहीं जाएंगे,और यह कह दो कि बर्गर खाओगे तो आँखें नचाने के साथ बोलेंगे कि मैं तो दो खाऊंगा।
इसका मतलब आओ समझ जाएं कि ये वह बला है जो आसानी से काबू नहीं आएगी।
क्या समझें!
बहरहाल जिसे मिला है वह किशमिश खाएगा और जिसे नहीं मिला,वह कसम से ऐसी हरकतें करेगा कि क्या जुगत लगाएं कि स्थानीय स्तर पर रॉक
स्टार कहलाएं।
अंदर की बात! वे दिन लद गए,असलियत का फंडा क्या है! कोई नहीं जानता। बड़ा मैच फिक्स है,ये तो बड़ी अकल वाले ही विमर्श करेंगे,वैसे मंदिरों में मिसरी मिलने लगीं है और गुरुद्वारों में देशी घी का हलवा,अपने को तो दोनों पसंद है।
लगे रहो आप जुगाड में,कुछ नहीं होगा।
शरीर स्वस्थ रहें,हाथ पांव चलते रहें,वही इनाम है,बाकी तो जाना ही है हरि के द्वार,इस बात को नहीं भूलना चाहिए।
समझनी होगी बात तो ,लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि लोग समझते हुए भी समझना नहीं चाहते।
पांडेय जी ने सोचा कि स्वेटर पहन लूं,साहनी साहब ने देखा और पूछ लिया कि अभी तो सर्दी नहीं आई! और आपने क्या किया!
पांडेय जी ने कहा कि था तो पहन लिया,पर मेरी यह चिंता बड़े मौलिक किस्म की है कि आपके पास तो सब कुछ है लेकिन आप इस अवस्था में कैटवॉक क्यों कर रहे है!
साहनी साहब जरा चौंके कि कैटवॉक कहां और कौन!
तभी चमनलाल जी ने कहा कि पांडेय जी को समझना हर किसी के बस की बात नहीं!
वाकई जिंदगी जो करती है उसको स्वीकार कर लेना चाहिए;पांडेय जी ने आसमान को देखा और मुस्करा दिए, मुस्कराने से जिंदगी खूबसूरत हो जाती है,ऐसा वे मानते है,अब सोचिए कई लेखक इसी बात पर इतराते है कि उन्होंने इतना लिख लिया जबकि गली के चाचा लोग भी नहीं पहचानते,बाकी जो होगा वह अच्छा हो या बुरा,उसे होना ही है।
जे राम जी की।







