विजयमनोहरतिवारी

भोपाल की स्मृतियों में बाबा कारंत के नाम के साथ केवल रंगमंच की रोशनी और आवाजें ही नहीं हैं। एक विभा भी है। आग भी है। धुआँ भी। पुलिस भी है। अदालत और जेल भी। सांसारिक मनुष्य के जीवन में कौन सा मोड़ कहाँ उठाए-गिराए कौन जानता है। वह है तो गलतियों का पुतला ही। किंतु कारंत विवादों के उस स्याह पक्ष के पार आज भी चमक रहे हैं तो यह केवल कला के कारण है।

19 सितंबर ब. व. कारंत के संक्षिप्त नाम से प्रसिद्ध बाबूकोडि वेंकटरामन कारंत का जन्म दिन है। वे आज होते तो 96 साल के होते। उन्हें गए हुए 23 साल हो गए। वे कर्नाटक के थे, दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़े और वहीं निदेशक हुए। निश्चित ही उनको दिल्ली से लेकर मैसूर और बेंगलुरू तक रंगमंच से जुड़ी संस्थाओं में याद किया जाता होगा मगर भोपाल के भारत भवन में भी उनकी यादें अमिट हैं।
भारत भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष वामन केंद्रे ने पिछले साल सुझाया कि पुण्यतिथि की बजाए उनके जन्मदिन पर उन्हें विस्तार से याद किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर उनसे जुड़े रहे लोगों को जोड़कर।
भारत भवन ने ऐसा ही किया। प्रणति शीर्षक से चार दिन के उत्सव का शुभारंभ केंद्रेजी ने ही किया, जो स्वयं एनसीडी के निदेशक रहे हैं। भारतीय रंगमंच के संदर्भ में उन्होंने कहा कि कारंत जैसी विभूतियों के योगदान के उत्सव मनाए जाने चाहिए ताकि नई पीढ़ी के वाहकों को ज्ञात हो सके कि भारत में रंगमंच के विविध आयाम किस प्रकार विकसित होते हुए चले हैं। “भारत अपनी विविधताओं में इतना विस्तृत और मोहक है कि उसे समझने के लिए एक जन्म काफी नहीं है।’
उन्होंने महाराष्ट्र के एक रंगकर्मी बाल गंधर्व का किस्सा सुनाया, जो जीवन भर नाटकों में स्त्री पात्रों की भूमिका निभाते रहे। वे अपने स्त्री पात्रों में इस कदर डूबते थे कि उनके श्रृंगार की नकलें सचमुच में दर्शक स्त्रियाँ किया करती थीं। उनके रूप श्रृंगार फैशन की तरह फैले थे।
मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय के निदेशक संजय श्रीवास्तव टीकमगढ़ के पास मवई नाम के गाँव के हैं, जिन्होंने भारत भवन के निर्माण के समय में कारंत के किस्से पहली बार गाँव में ही सुने थे। एक ऐसे रंगकर्मी के किस्से जिनके नाटकों को देखने के लिए टिकट लेकर लोग लाइन लगाकर खड़े हैं। रंगमंच और रंगकर्म ये दो शब्द भी पहली बार उनकी स्मृतियों में तभी अंकित हुए और गाँव की पगडंडियों से होकर वे दिल्ली के एनएसडी जा पहुंचे, जहाँ पहली बार उस रंगऋषि के दर्शन निकट से हुए।
कारंत के संग काम करने वाले सर्वाधिक स्मृति समृद्ध हैं भोपाल थिएटर्स के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध अभिनेता राजीव वर्मा, जिनकी नाटक मंचन के दौरान कड़क अनुशासन को लेकर कारंत से असहमतियाँ रहीं। जैसे दस साल से कम आयु के बच्चों को प्रवेश नहीं दिया जाए। एक पुरानी पत्रिका के विशेषांक से वे वह किस्सा पढ़ते हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। 1983 में किसी विमान अपहरण का किस्सा, जिसमें स्वयं कारंत सवार थे। अपहरणकर्ता का नाम सरदार मुसीबतसिंह। लाहौर के चक्कर लगाकर विमान अमृतसर उतरा, जहाँ भूखे यात्रियों को भोजन के लिए मुसीबतसिंह किसी से संपर्क कर रहे थे।
आभा परमार कहती हैं रंगमंच पर हमारे जन्मदाता कारंत हैं, जिनकी उंगली पकड़कर मंचों पर चलना सीखा। भारत भवन में आकर जिन्हें आज भी घुटनों चलते बालक जैसी अनुभूति जीवंत होती है। ऐसा लगता है कि बगल में किसी परदे के पीछे से बाबा अभी प्रकट हो जाएंगे और किसी गलती पर फटकार लगाने से नहीं चूकेंगे।
भारत भवन को बने हुए 43 साल हो गए। 20-25 साल के उस समय के युवा रंगकर्मी अब अपनी आयु के अमृत महोत्सव की ओर गतिशील हैं। भोपाल की स्मृतियों में कारंत के नाम के साथ केवल रंगमंच की रोशनी और आवाजें ही नहीं हैं। एक विभा भी है। आग भी है। धुआँ भी। पुलिस भी है। अदालत और जेल भी।
सांसारिक मनुष्य के जीवन में कौन सा मोड़ कहाँ उठाए-गिराए कौन जानता है। वह है तो गलतियों का पुतला ही। अगर किसी नेता या अफसर या कारोबारी के जीवन में यह घटता तो उसे याद करने वाला आज कौन होता? मगर कारंत विवादों के उस स्याह पक्ष के पार आज भी चमक रहे हैं तो यह केवल कला के कारण है। कला अपने हर रूपक में अमिट प्रभाव छोड़ती है। कला के किसी भी पक्ष को निष्ठा से समृद्ध करने वाले कहीं न कहीं अपनी अमरता की मुहर स्वयं लगाकर निकलते हैं।
भारत भवन में उनकी यादों का उत्सव सच्चे रूप में रंगमंच को उनके योगदान का ही उत्सव है। 1982 में अपनी यात्रा के आरंभिक वर्षों में रचे गए नाटकों के आकर्षक पोस्टरों की प्रदर्शनी उस समय की स्मृति भी ताजा करती है, जब एक मुख्यमंत्री बाकायदा टिकट लेकर भारत भवन में नाटक देखने आया करते थे। वे अर्जुनसिंह थे, जिनके समय कलाओं से महकता हुआ यह आँगन भोपाल के स्वर्णिम पृष्ठ की तरह जुड़ा था।
Shashi Kumar Keswani

Editor in Chief, THE INFORMATIVE OBSERVER